लघु कथा
अरे भाई हँसमुख जी, आज क्यूँ उदास हो, क्या हुआ ? क्या बताऊँ मैं आज बहुत परेशां हूँ, आप ही बताओ आप को कैसा लगेगा यह जान कर कि आप जिस घर में पिछले दस साल से अकेले रहते हो, उसमे आप के अलावा कोई और भी अचानक आकर रहने लगे !! कल रात कुछ लोग अचानक मेरे घर में मेरे ही सामने मेरे घर में डेरा डाल कर बैठ गए और अपना आधिपत्य जताने लगे और मैं कुछ न कर सका | जी में तो आया कि एक एक को उठाकर फेंक दूं पर क्या करे हमारी भी कुछ अपनी सीमायें हैं | क्या करूँ कौन से तंत्र मंत्र का सहारा लूं कि वो भाग जाएँ, पर सोचता हूँ कि इसमें इनका क्या दोष, दोष तो मेरे ही अपनों का है जिन्होंने मेरे हाथो से बनाए हुए दिनरात मेहनत करके बनाए हुए मेरे इस आशियाने को दूसरों को बेच दिया | कल वो मेरा श्राद्ध दूसरे देश में मना रहे हैं, अपना देश अपना आशियाना छोड़ कर इतनी दूर कैसे जाऊं इसी लिए मैं आज बहुत दुखी हूँ मित्रो |
Comment

बहुत बहुत आभार सौरभ जी आपने इस कहानी के मर्म को महसूस किया

बहुत-बहुत बधाई, राजेशकुमारी जी. इस सार्थक प्रयास को देख कर एहसास हुआ कि वास्तव में विलम्ब से इस पन्ने पर आ पाया.

bahut bahut aabhar Ajay kumar ji aapne is laghu katha ko dil se mehsoos kiya.
Comment by AjAy Kumar Bohat on April 13, 2012 at 9:23am dil ko chhoo lene wali kahani...

जी आशा जी जिस आशियाने मे तुम्हारी आत्मा बसी हो वो कहाँ छूट ता है आभार |
Comment by asha pandey ojha on February 25, 2012 at 11:12pm waaaaaah kitni marmsprshi kahani hai .. jade nahi chhoti .. jivan chhotne ke baad bhi yah katu saty hai

Nazeel ji shukriya.
Comment by N .B. Nazeel on February 25, 2012 at 5:37pm 
हा गणेश जी बुजुर्गों की भावनाओं का क्या

सच बच्चे तरक्की कर गए !!!!!!!!!!!!
पुस्तैनी धरोहर बेच कर,
बाप का श्राद्ध कर्म विदेश में कर रहे,
सच बच्चे तरक्की कर गए !!!!!!!!!!
सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई हो |
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