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किसे आवाज़ दूँ (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

बह्रे रमल मुसम्मन महज़ूफ़
2122  / 2122  /  2122  /  212

जिस तरफ़ देखूँ है तन्हाई किसे आवाज़ दूँ
हर मसर्रत दिल की गहनाई किसे आवाज़ दूँ

ना-उमीदी दिल पे है छाई किसे आवाज़ दूँ
दौर-ए-ग़म से रूह घबराई किसे आवाज़ दूँ

बंद है हर दर यहाँ तो हर गली वीरान है
ज़िन्दगी मुझको कहाँ लाई किसे आवाज़ दूँ

कोई भी ऐसा नहीं जो दर्द-ओ-ग़म समझे मेरा
हर तरफ़ हैं बस तमाशाई किसे आवाज़ दूँ

ज़िन्दगी की कशमकश ने इतना तन्हा कर दिया
भाई भी अब तो नहीं भाई किसे आवाज़ दूँ

इम्तिहाँ कैसे कड़े आए हैं राह-ए-शौक़ में
मैं हूँ और है आबला-पाई किसे आवाज़ दूँ

रौशनी मुरझा रही है ज़ुल्मतों के दौर में
तीरगी हर सम्त गहराई किसे आवाज़ दूँ

ले चला फिर कू-ए-जानाँ की तरफ़ 'शाहिद' मुझे
दिल हुआ जाता है सौदाई किसे आवाज़ दूँ
(मौलिक व अप्रकाशित)
नोट: ये ग़ज़ल उस्ताद-ए-मुहतरम समर कबीर साहिब की ज़मीन में ह

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Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on July 12, 2020 at 12:19pm

आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, आदाब। ग़ज़ल पर आप की हाज़िरी और हौसला-अफ़ज़ाई के लिए बहुत शुक्रिया हुज़ूर!

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on July 12, 2020 at 12:16pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब, ग़ज़ल को पसंद करने के लिए, हौसला बढ़ाने के लिए, और आपके सुझाव के लिए बेहद शुक्रगुज़ार हूँ जनाब!

Comment by सालिक गणवीर on July 11, 2020 at 9:37am

आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' साहिब

आदाब

बेहद उम्दा ग़ज़ल हुई है ,जनाब.दिली मुबारकबाद क़ुबूल फरमायेंं

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on July 10, 2020 at 9:03pm

मुहतरम जनाब रवि भसीन 'शाहिद' साहिब, आदाब।

इस उम्दा ग़ज़ल पर शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।

"जिस तरफ़ देखूँ है तन्हाई किसे आवाज़ दूँ

हर मसर्रत दिल की गहनाई किसे आवाज़ दूँ"  जनाब, "हर मसर्रत दिल की गहनाई" मेरे नज़रिए से कमज़ोर शिल्प है और मिसरा ए ऊला के साथ रब्त की भी कमी महसूस हो रही है, अगर मुनासिब लगे तो सानी मिसरा यूँ कर सकते हैं :

"साथ अपनी ही न परछाई किसे आवाज़ दूँ"   सादर। 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on July 10, 2020 at 5:56pm

आदरणीय रूपम कुमार 'मीत' भाई, आपकी नवाज़िश और मुहब्बत के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया!

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on July 10, 2020 at 5:54pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' भाई, आपकी ज़र्रा-नवाज़ी और हौसला-अफ़ज़ाई के लिए बेहद शुक्रगुज़ार हूँ।

Comment by Rupam kumar -'मीत' on July 9, 2020 at 7:35pm

बंद है हर दर यहाँ तो हर गली वीरान है
ज़िन्दगी मुझको कहाँ लाई किसे आवाज़ दूँ

आदरणीय रवि साहब, आपको बधाई देता हूँ पूरी ग़ज़ल के लिए, क्या खूब कहा है आपने और इस शेर पर ख़ास तौर पर दाद देता हूँ।।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 9, 2020 at 5:23pm

आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

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