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Amod shrivastav (bindouri)'s Blog – December 2018 Archive (1)

है बहुत कहने को लेकिन अब तो चुप बहतर है।।

बह्र- 2122-2122-2122-22

है बहुत कहने को लेकिन अब तो चुप बहतर है।।

जो समझ पाए न तुम क्या फायदा कहकर है।।

शोर कितना ही मचाये, या करे अब बकझक।

मैं समझ लेता हूँ मेरा दिल भी इक दफ्तर है।।

खुश नशीबी है मेरी नफ़रत मुहब्बत जंग की।

हार कर भी जीतने जैसा ही इक अवसर है।।

अब मैं ढक लेता हूँ  खुद-का ये बदन अच्छे से।

अब नहीं मैं पहले जैसा गन्दगी अंदर है।।…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on December 23, 2018 at 3:01pm — 2 Comments

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