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Sunil Verma
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Dr. Vijai Shanker commented on Sunil Verma's blog post जड़ें (लघुकथा) -सुनील वर्मा
"बात तो बहुत साधारण सी है पर कहने का अंदाज़ लाजवाब है। विश्वास को ज़िंदा रखना ही बड़ी बात है , बधाई , सुनील जी , सादर।"
Thursday
Nita Kasar commented on Sunil Verma's blog post जड़ें (लघुकथा) -सुनील वर्मा
"कथा में नयापन लिये अलग ही विषय उठाया है ।आपने ।अंतिम पंक्तियों में मन छू लिया ।अधिकतर एेसा ही होता है ।बधाई आद० सुनील वर्मा जी ।"
Thursday
VIRENDER VEER MEHTA commented on Sunil Verma's blog post जड़ें (लघुकथा) -सुनील वर्मा
"बहुत उम्दा कथा भाई सुनील वर्मा जी, वास्तव में विश्वास एक ऐसी चीज है जो एक बार खोने के बात दुबारा नहीं लौट पाती... हार्दिक बधाई इस लघुकथा के लिए भाई जी ....सादर"
Thursday
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"यह रिवर्स गियर लगाना ही था तो वह आयी ही क्यूँ...? सिर्फ पड़ोसन के टोकने भर से ह्रदय परिवर्तन थोड़ा असहज लगता है| एक वाक्स में पड़ोसन का कहना 'लगता है इसका पति कुछ ज्यादा ही...' यहाँ पात्र को कोई नाम देना अधिक उपयुक्त होगा| समान्यत: पड़ौसी…"
Aug 31
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"यह बेसब्री भी वर्तमान में महामारी का रूप ले चुकी है| कोई भी दो मिनिट का अतिरिक्त समय देना नही चाहता|संक्षिप्त और सटीक रचना है|थोड़ी प्रश्ननुमा अधिक है मगर चिंतन को विवश करती है|"
Aug 31
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"जैसे ही शर्मा जी ने दोनों के लिए पानी मँगवाया..वहीं से यह कहानी अशोक भाटिया जी की 'टूटे कपों की कहानी' की तरफ मुड़ गयी| अंत का पूर्वानुमान होते ही मैं सीधा अंतिम पंक्ति पर आ गया| कथा का प्रथम हिस्सा भी थोड़ा अतार्किक लगा|रोज अपने बंगले के…"
Aug 31
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"कथा का प्रवाह बहुत अच्छा है मगर जो बात होनी चाहिए थी वह नदारद है|अंत में टीटी का मन बदलना यह तो स्पष्ट करता है कि वह समझ गया था कि युवक सही बोल रहा है मगर यह तो कथा कि स्पष्टता हुई| वह अनकहा यहाँ नजर नही आ रहा जिसकी वजह से यह मात्र एक सामान्य घटना…"
Aug 31
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"संक्षिप्त और सटीक| हर शब्द कसा हुआ| हर वाक्य सधा हुआ| बेहद चुस्त दुरूस्त लघुकथा"
Aug 31
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"मौहल्ले के कुत्तों ने बैठक आयोजित की| सड़क वालों ने पूछा 'तुम्हारा क्या है..तुमको तो..' पालतू कुत्तों ने कहा 'इसमें हमारा क्या दोष..' पहले यह तो पता चले कि यह दोषारोपण करने की बैठक हुई किस बात पर थी? यहाँ एक सशक्त वजह की जरूरत…"
Aug 31
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"अच्छा लिखा है आपने अर्चना जी| हाँ..उस्मानी जी से मैं भी सहमत हूँ कि संवादों में कथन की स्पष्टता हो जाने से यह विषयाधारित नही रही, मगर आपकी शैली ने कथा को बहुत अच्छा स्वरूप दिया है| हार्दिक बधाई"
Aug 31
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"संभवतद कथा को पत्रात्मक रूप में लिखने की वजह ही यही रही हो कि उसमें एक ही कालखंड (पत्र लिखते हुए) में रहकर अलग अलग कालखंड समेटे जा सकें|"
Aug 31
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"मुझे नही पता कि मैनें सही पढ़ा या नही, मगर जे मैनें समझा वह यह था कि (बर्फ की चोटियाँ और चिनार के पेड़)कोई कश्मीरी युवक पढ़ने के लिए उत्तर भारत या देश के किसी दूसरे हिस्से में आया हुआ है| मगर जब कथा में मैच का जिक्र हुआ (हमारी तरफ का कोई आऊट होता)…"
Aug 31
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"मैं हर आयोजन में आपकी रचना का इंतजार करता हूँ| बेहद शानदार लघुकथा है यह| बहुत बहुत बधाई प्रतिभा जी|"
Aug 30
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"दरअसल छिलका मैनें इस संदर्भ में लिखा था कि अक्सर माता पिता अपनी संतान पर एक सुरक्षात्मक आवरण की तरह होते हैं|जिस तरह से फल के पकने के बाद छिलके को उतार फेँक दिया जाता है, प्रस्तुत कथा में पिता को भी बेटे बहू छिलके की तरह अपनी जिंदगी से ऊतार देते हैं|"
Aug 30
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"" तुम्हें पता हैं, यहाँ के छोले भटूरे बेहद लज़ीज़ हैं ! कभी ट्राइ किए ?" मनोहर ने रेस्टोरेंट में कोने की एक टेबल की ओर जाते हुए उसने कहा " हूँउउउ! " धीरे से मुस्कुराते हुए वह भी सामने की कुर्सी खींचकर बैठ गई. बहुत ऊँची…"
Aug 30
Sunil Verma replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-29 (विषय: अनकहा)
"'उसकी ह्रदय भूमि के मरूस्थल में न जाने कब तक उपेक्षाओं के बवंडर उठते रहते यदि उस पर उसके बॉस....'"
Aug 30

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जड़ें (लघुकथा) -सुनील वर्मा

"सुन न यार..क्यूँ इस ट्रेफिक जाम में पसीने बहा रहा है? सायरन ऑन कर और जगह बनाता चल.." खाली एंबुलेस में चालक के पास वाली सीट पर बैठे उसके दोस्त ने समझाया|



"नही भाई..पाँच दस मिनिट देर से ही सही| हमें किस बात की जल्दबाजी है..? गाड़ी में कोई मरीज थोड़े ही लेटा हुआ है, खाली ही तो है|" चालक ने अपने दोस्त से कहा|



"अररे तो बाहर लोगों को थोड़े ही पता है कि पीछे मरीज लेटा है या नही" दोस्त ने उसे अपना अतिरिक्त ज्ञान दिया|



असर हुआ और सामने रेंगते हुए ट्रेफिक को देखकर चालक… Continue

Posted on September 17, 2017 at 9:50pm — 8 Comments

भरोसा (लघुकथा) -सुनील वर्मा

टूटी सड़क| भारी यातायात| साफ सुथरे कपड़े पहने हुए एक युवक बार बार अपने गले में बँधी टाई सही कर रहा था| तभी सामने ने ऑटो आता देख उसने हाथ देकर उसे रोका|

ऑटो में बैठते ही युवक ने चालक को अपने गंतव्य स्थान के बारे में बताया और ज़ेब से फोन निकालकर किसी से बातें करनी शुरू कर दी| देश में बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी और धार्मिक अराजकता पर बातें करता हुआ वह सरकार को कोस ही रहा था कि ऑटो चालक ने अब तक लगभग दो सौ मीटर की दूरी तय करने के बाद आगे बने एक पेट्रोल पंप पर अपना ऑटो रोका|

"साहब पेट्रोल… Continue

Posted on July 19, 2017 at 9:20am — 5 Comments

कमज़ोर आदमी (लघुकथा) -सुनील वर्मा

बेहद कमजोरी के बावजूद सुगणा ने कंधो के सहारे जोर लगाकर नीचे सरक आये अपने सिर को तकिये पर टिकाया| अधखुली आँखों से खुद को देखा| रक्तस्राव की अधिकता के कारण हर बार वह पहले से ज्यादा अशक्त होती जा रही थी| तीन बार की ज़चगी के बाद अब उसमें और हिम्मत नही बची थी| बात करने पर उसके पति ने उसकी बात मान भी ली थी, मगर शर्त थी की आवश्यक ऑपरेशन वह ही करवायेगी| आज उसी ऑपरेशन के बाद वह बिस्तर पर पड़ी थी| शरीर पहले से ही सुन्न था, अब दिमाग भी सुन्न हो चुका था|

गहरी फूँक छोड़ते हुए उसने…

Continue

Posted on July 15, 2017 at 8:00am — 6 Comments

ऑक्सीजन (लघुकथा ) -सुनील वर्मा

रविवार का दिन था| अखबार पढ़ने के बाद कमलेश जी बरामदे में बैठे रेडियो पर गानें सुन रहे थे| एकाएक उनके कानों में इकतारे की धुन के साथ साथ लोक संगीत के बोल घुल गये|

आँखे खोलकर उन्होने आवाज की दिशा में देखा| दरवाजे पर खड़ा एक बूढ़ा याचक कुछ गाते हुए इकतारा बजा रहा था| वह दरवाजे तक गये और उसे वहीं बाहर बने चबूतरे पर बैठने के लिए कहा|

"बहुत अच्छा गाते हो| कहाँ से हो?" उसके बैठते ही उन्होनें सवाल किया|

"बहुत दूर से…

Continue

Posted on July 11, 2017 at 11:43am — 11 Comments

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At 8:06pm on December 17, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय सुनील वर्मा जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी लघुकथा "तृप्ति" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

 
 
 

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