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Rupam kumar -'मीत'
  • Male
  • Bihar
  • India
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Welcome, रुपम कुमार -'मीत'!

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने मुबारकबाद पेश करता हूँ। एक अदना कोशिश की है, देखियेेगा।  दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे रक़ीब  मेरा  भला  कैसे  ये  दग़ा  न  करे …"
1 hour ago
सालिक गणवीर commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"प्रिय  Rupam kumar -'मीतसादर अभिवादन एक बहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ स्वीकार करें,जैसा कि कबीर साहब ने कहा या तो जुल्फें कर लो या बिखरेगी कर लो,खुश रहो और यूँ ही लिखते रहो."
4 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय समर कबीर साहिब, मैं और प्रयास करता हूँ, दिल से शुक्रिया"
Saturday
Samar kabeer commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"'लगा के आग मेरे घर को फिर हवा न करे किया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे' मुझे इनमें भी रब्त नहीं लगता ।"
Saturday
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय समर कबीर साहिब दंडवत प्रणाम, मत्ला यूँ कहे तो लगा के आग मेरे घर को फिर हवा न करे किया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे मार्गदर्शन कीजिए साहिब,,"
Saturday
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आ, लक्ष्मण धामी साहिब प्रणाम, ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत शुक्रिया साहिब।"
Saturday
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय नीलेश जी, बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आ. भाई रूपम जी, अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई ।"
Saturday
निलेश बरई (नवाज़िश) commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय रूपम साहब,बहुत ही उम्दः ग़ज़ल कही है आपने  बधाई स्वीकार करें इस ग़ज़ल के लिए .."
Saturday
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीया अमिता तिवारी जी,, बहुत शुक्रिया आपका ग़ज़ल तक आई, और बालक का हौसला बढ़ाया।। आपका दिन शुभ हो। प्रणाम।"
Friday
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"आदरणीय समर कबीर साहिब प्रणाम, बहुत दिन के बाद मैं इस मंच पर वापस आया हूँ, और आपकी इस्लाह बहुत ख़ुशी मिली, साहिब मत्ला मुझे ठीक लग रहा है, लेकिन शाइरी की समझ उतनी नहीं है मैं एक बार फिर कोशिश करता हूँ। तीसरे शेर में ऊला को दुरुस्त करना होगा वो मैंने…"
Friday
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 1222×4ज़मीं भाती नहीं और आसमाँ अच्छा नहीं लगता कहाँ ले जाएँ दिल को ये जहाँ अच्छा नहीं लगता[1]मेरा दम शहर में घुटता है  कुछ दुख गाँव में भी हैं यहाँ अच्छा नहीं लगता वहाँ अच्छा नहीं लगता [2]वो अपने हाथ से जुगनू  नहीं ऊपर उड़ाता तो सितारों के बिना ये आसमाँ अच्छा नहीं लगता [3]हमारे घर में भी ख़ुशियाँ सभी मौजूद हैं लेकिन हमें बरसात में अपना मकाँ अच्छा नहीं लगता [4]नहीं हो हम-सफ़र जब साथ उस तन्हा मुसाफ़िर को सड़क से हर गुज़रता कारवाँ अच्छा नहीं लगता [5]किसी की चाह में जब से हुए बर्बाद हमको 'मीत' यकीं…See More
Friday
Samar kabeer commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
"जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, क़तील शिफ़ाई की ज़मीन में ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । 'दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करेकिया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे' मतले के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,ऊला बदलने का…"
Thursday
amita tiwari commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')
" बहुत  अच्छी,सरल और सच्ची भाव रचना "
Thursday
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र:- 1212 1122 1212 112दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करेकिया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे [1]उसे है इल्म बिछड़ने से लोग टूटते हैंतभी वो मोतियों को डोर से जुदा न करे [2]बुज़ुर्ग हो गया हूँ ज़िंदगी से इसलिए भीवो देख भाल करे पर मेरी दवा न करे [3]नहीं है ख़ौफ़ समंदर में डूबने का मुझेमगर यूँ क़र्ज़ में मरना पड़े ख़ुदा न करे [4]मुहाल है ज़मीं से आसमान तक का सफ़रबुलंदियों पे यूँ जा कर कोई गिरा न करे [5]मैं झूटी ज़िंदगी से अब नजात चाहता हूँतवील उम्र की मेरी कोई दुआ न करे [6]ख़ुदा क़ुबूल करे आख़री दुआ ये…See More
Wednesday
Rupam kumar -'मीत' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदणीय नाथ सोनांचली साहिब प्रणाम, बहुत अच्छी कोशिश दिखाई देती है आपकी ग़ज़ल में और कुछ शे'र नए दौर कर लिए एक दम नए। पढ़ कर बहुत अच्छा लगा साहिब, शुक्रिया।"
Feb 25

Profile Information

Gender
Male
City State
Motihari
Native Place
Bihar
Profession
Student
About me
मुझे तो सभी बोलते है कि लड़का भला भी नहीं तो बुरा भी नहीं है -'मीत'

Rupam kumar -'मीत''s Blog

दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र:- 1212 1122 1212 112

दिया जला के उसी सम्त फिर हवा न करे

किया है जो मेरे दुश्मन ने वो सगा न करे [1]

उसे है इल्म बिछड़ने से लोग टूटते हैं

तभी वो मोतियों को डोर से जुदा न करे [2]

बुज़ुर्ग हो गया हूँ ज़िंदगी से इसलिए भी

वो देख भाल करे पर मेरी दवा न करे [3]

नहीं है ख़ौफ़ समंदर में डूबने का मुझे

मगर यूँ क़र्ज़ में मरना पड़े ख़ुदा न करे [4]

मुहाल है ज़मीं से आसमान तक का सफ़र

बुलंदियों पे यूँ जा कर कोई गिरा न…

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Posted on March 3, 2021 at 9:23am — 13 Comments

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 2122 1122 1122 22(112)

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा

और हँसते हुए दुनिया से गुज़र जाऊँगा [1]

जो सिला मुझ को मिला है यहाँ सच बोलने से

अब तो मैं झूट ही बोलूँगा जिधर जाऊँगा [2]

रात को ख़्वाब में आऊँगा फ़रिश्ते की तरह

और आँखों से तेरी सुब्ह उतर जाऊँगा [3]

ख़ून छन छन के निकलता है कलेजे से मेरे

रोग ऐसा है कि कुछ रोज़ में मर जाऊँगा [4]

सामना होने पे पूछेगा तू , पहचाना मुझे?

गर मैं पहचान भी…

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Posted on October 15, 2020 at 5:30pm — 12 Comments

हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी (~रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 1212 / 1122 / 1212 / 22 (112)

अज़ाब-ए-हिज्र में सुख-दुख के गीत गाए भी

हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी [1]

ख़ुदा ने ख़ल्क़ किया है चराग़ जैसा हमें

वही जलाए हमें फिर वही बुझाए भी [2]

अजीब साल ये गुज़रा हमारी जिंदगी में

ख़ुदा करे न दुबारा कभी फिर आए भी [3]

हमारे यार का अंदाज़-ए-इश्क़ सबसे जुदा

कभी हँसाए वो हमको कभी रुलाए भी [4]

गुलाब जैसे लबों से वो हमको चूमता है

निशान प्यार के सीने से फिर मिटाए…

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Posted on September 27, 2020 at 1:00am — 17 Comments

अब से झूटा इश्क़ नहीं करना जानाँ (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र-22/22/22/22/22/2

अब से झूटा इश्क़ नहीं करना जानाँ

और किसी को मत देना धोखा जानाँ [1]

जब आँखों को दरिया करने का मन हो

तब मेरी रूदाद-ए-ग़म सुनना जानाँ [2]

दिन से रात तलक मैं तुमको रोता हूँ

तुम भी मुझको आठ-पहर रोना जानाँ [3]

अपने हाथ के कंगन जा पर रखना तुम

वाँ पर मेरी ग़ज़लें मत रखना जानाँ [4]

तुम रिश्तों में मत ढूँडो ख़ुशियाँ सारी

सीखो ख़ुद से मिलकर ख़ुश होना जानाँ [5]

आज जला दी वो…

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Posted on September 16, 2020 at 5:30am — 10 Comments

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At 5:49pm on July 3, 2020, Chetan Prakash said…

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