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Niraj Kumar
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Niraj Kumar commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - रोशनी है अगर तेरे दिल में- ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय रवि शुक्ला जी, उर्दू शायरी में फारसी और अरबी के शब्दों में इजाफत का प्रयोग बहुत हुआ है :   कितनी बे-नूर थी दिन भर नज़र-ए-परवाना रात आई तो  हुई  है सहर-ए-परवाना - शहज़ाद अहमद   ऐ ग़मे-दिल क्या…"
yesterday
Niraj Kumar commented on rajesh kumari's blog post ये जो इंसान आज वाले हैं (एक ही रदीफ़ पर दो गज़लें ---'राज')
"आदरणीया राजेश कुमारी जी, दोनों ग़ज़लें खूबसूरत हैं. दाद के साथ मुबारकबाद. सादर"
Sunday
Niraj Kumar commented on C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi"'s blog post आएँगे जी आएँगे, अच्छे दिन यूँ आएँगे ...गीत / शून्य आकांक्षी
"आदरणीय शून्य आकांक्षी जी, बहुत अच्छा गीत ! मारक व्यंग ! साहसपूर्ण ! जितनी दाद दी जाय कम है. इस गीत से पता चलता है कि साहित्यकार को सत्ता का शाश्वत प्रतिपक्ष क्यों कहते हैं . सादर "
Sunday
Niraj Kumar commented on surender insan's blog post ग़ज़ल " जिंदगी से जी भर गया कब का "
"आदरणीय सुरेन्द्र जी, उम्दा ग़ज़ल हुयी है दाद के साथ मुबारकबाद. और उतनी ही उम्दा है जनाब समर कबीर साहब की इस्लाह. सादर "
Sunday
Niraj Kumar commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...हर कदम पर जह्न मेरा आजमाता कौन है-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"आदरणीय बृजेश जी,  ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद. सादर "
Sunday
Niraj Kumar commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - रोशनी है अगर तेरे दिल में- ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय गिरिराज जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है. दाद के साथ मुबारकबाद. ये स्पष्ट नहीं हुआ कि  'नज़र-ए-बातिल' पर जनाब समर कबीर साहब को आपत्ति क्यों है. सादर "
Sunday
Niraj Kumar commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(आज चढ़ता जा रहा पारा बहुत)
"आदरणीय मनन जी, आखिरी शेर अस्पष्ट है. बाकी सारे शेर अच्छे लगे. दाद के साथ मुबारकबाद. सादर "
Saturday
Niraj Kumar commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post कहने को शर्मीली आँखें
"जनाब समर कबीर साहब, आदाब, 'चर्चा वो सार्थक होती है जो सही बिन्दू पर की जाये,एक ऐसे शब्द पर की गई चर्चा जिसका उर्दू हिन्दी शब्दकोष में दूर दूर तक पता नहीं,समय की बर्बादी है,' शब्द पहले सामान्य व्यवहार में आते है वो शब्दकोश में बाद में…"
Saturday
Niraj Kumar commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post कहने को शर्मीली आँखें
"आदरणीय बसंत जी, ग़ज़ल की भाषा का आधार शब्दकोशीय शब्द से ज्यादा लोक व्यवहार की भाषा होती है. शब्दकोशों में हज़ारों ऐसे शब्द होते है जो व्याकरणिक संभावनाओं के तहत रख लिए जाते है. जबकि व्यव्हार में नहीं आते. व्याकरणिक संभावनाओं का आधार हरदम उपयुक्त होता…"
Saturday
Niraj Kumar commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - आदमी वो सरफिरा, लगता तो है ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय गिरिराज जी, साजिशन की भले शब्दकोश में इंट्री न हो यह आज जीवित भाषा का अभिन्न अंग है. और बेहतर कवि का उपजीव्य जीवित भाषा और उसकी अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा होती है.  'साजिशन ऐसा हुआ, लगता तो है' से प्रभावी मिसारा मिलना मुश्किल है.…"
Aug 9
Niraj Kumar commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post कहने को शर्मीली आँखें
"आदरणीय बसंत जी,  'सकुचीली' का हिंदी साहित्य में प्रयोग मेरी नज़र से नहीं गुज़ारा. सामान्य भाषा में भी इसके प्रयोग कि स्थिति इस बात से समझी जा सकती है कि गूगल पर सर्च करने पर इसकी इंट्री ही नहीं मिलती. सादर  "
Aug 9
Niraj Kumar commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post कहने को शर्मीली आँखें
"जनाब समर कबीर साहब, आदाब, ''साजिशन'की कोई एक मिसाल पेश कीजिये,अगर ये आम है तो,और मिसाल गूगल से नहीं साहित्य से पेश कीजियेगा,शुक्रगुज़ार रहूँगा'  तात्कालिक तौर पर कविताकोश से कुछ उदहारण : वही सनातन स्त्रीजिसकी दुनिया घूमती…"
Aug 9
Niraj Kumar commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post कहने को शर्मीली आँखें
"जनाब समर कबीर साहब, आदाब,  'साजिशन' हिंदी में अब आम प्रोयोग का हिस्सा है 'सकुचीली' नहीं है. आप दोनों शब्द गूगल पर सर्च करें फर्क का पता चल जाएगा.  सादर "
Aug 8
Niraj Kumar commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post कहने को शर्मीली आँखें
"आदरणीय बसंत जी, अच्छी ग़ज़ल हुयी है दाद के साथ मुबारकबाद. मतले में संकोची के अर्थ में सकुचीली का प्रयोग थोड़ा खटकता है. सादर "
Aug 8
Niraj Kumar commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - आदमी वो सरफिरा, लगता तो है ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय गिरिराज जी, एक और अच्छी ग़ज़ल के लिए दाद के साथ मुबारकबाद. 'जान कर' या 'साजिश में' वो बात नहीं है जो 'साजिशन' में है. और साजिशन में मुझे कुछ आपतिजनक नहीं लग रहा. अगर व्यंजक और उपयुक्त हो तो नया शब्द भी आजमाने में…"
Aug 8
Niraj Kumar commented on Gajendra shrotriya's blog post ग़ज़ल - इक जलतरंग दिल में बजाकर चले गए
"आदरणीय गजेन्द्र जी, बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद, 'कुछ अपनी भूमिका को निभाकर चले गए'  मेरे ख्याल से इस मिसरे में 'भूमिका को' कि जगह 'भूमिकायें' का प्रयोग बेहतर होगा.  सादर "
Aug 8

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhojpur
Native Place
Bhojpur
Profession
Teaching

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"आदरणीय रवि शुक्ला जी सृजन के भावों को अपनी स्नेहाशीष से उत्साहित करने का हार्दिक आभार। "
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"आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी सृजन को मान देने का हार्दिक आभार।"
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