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Mohit mishra (mukt)
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  • allahabad,u.p
  • India
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somesh kumar commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post मेरे प्यार!
"जो अबतक पढ़ा था-उस दर्द को आज पहचाना,बड़ा मुश्किल होता है-अंदर-अंदर घुटना, बाहर मुस्कुराना,पर हम इसलिए नहीं पिते आँसू-कि दुनिया के सामने रोने में शर्म आती है,बस कोई प्यार को मज़ाक़ बना देता जब,कशम से बर्दाश्त नहीं होता। Sari kavita ka bhav in…"
Wednesday
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post मेरे प्यार!
"जनाब मोहित जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Wednesday
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

मेरे प्यार!

उस रात रह गया, दिये की थरथराती लौ पर, काँपता सुबकता हमारा प्यार स्याह निशा की स्तब्धता- थी छा गयी तेरे मेरे दरम्यान, निगल लिया था अंधकार ने- हमारे कितने किरण-पुंज, अविरल अश्रु-प्रवाह के बीच, थे ब्याकुल तुम, विक्षिप्त मैं , और साँसों की ऊष्णता से, थी घुटती हवा हमारे आस-पास, वेदना-संतप्त मस्तिष्क में , गुंजित थे तुम्हारे भीगे-भीगे शब्द, जो डबडबाई आँखों समेत- मुँह मोड़ कर तुमने कहा था , “यह मिलन आख़िरी है।”तुम्हें भी पता था, कि हमारा कोई भी मिलन, अंतिम हो ही नहीं सकता, हम चीरकाल तक मिलते रहे, और…See More
Wednesday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त
"अच्छी रचना हुई आदरणीय मोहित जी.."
Jul 5
Mohammed Arif commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त
"आदरणीय मोहित जी आदाब,                            अच्छी रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Jul 4
Sushil Sarna commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त
"आदरणीय मोहित जी सुंदर मनभावन रचना के लिए हार्दिक बधाई।"
Jul 4
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त
"जनाब मोहित जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Jul 3
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त

कह रही है दिल की धड़कन, कुछ दिनों से दूर हो तुम,आह सांसों की, तड़प की, अब मिटा दो पास आओ.यह अकेलापन मुझे अब काटने को दौड़ता है ,तन्हा पल की इस चुभन को अब मिटा दो पास आओ.आलिंगनों के द्वार तुमसे ,कह रहे हैं खोल बाहें,फूल के श्रृंगार जैसे गोद मेरी तुम सजा दो ,आंख के अरमान तुमसे कह रहे हैं इंगितों से ,देख लो तिरछी नजर से औ जरा सा तुम लजा दो ,होठ जो प्यासे हैं अबतक बोलते हैं सुन लो सजनी ,तुम जरा सा होठ अपने मेरे होठों से लगा दो ,है नहीं अब कट रहीं ये शून्य सी, स्याही सी रातें ,प्रेम-रश्मि से निशा को अब…See More
Jul 3
Mohit mishra (mukt) commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल....दिल जला के रौशनी होती नहीं है-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी अच्छी रचना के लिए बधाई"
Jun 26
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी , रचनावलोकन और सराहना के लिए शुक्रिया"
Jun 26
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"आदरणीया नीलम जी सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद"
Jun 26
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी उत्साहवर्धन का तहे दिल से शुक्रिया"
Jun 26
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"आदरणीय मोहित जी बहुत ही सुन्दर सरस कविता हुई है...बधाई"
Jun 22
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"बहुत खूब..."
Jun 21
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|पुनः कुठाराघात सह रहीं, माँ भारती कुछ वर्षों से । पीड़ादायी दंश दे रहे , नवल विषधर कुछ अरसे से। फण पर फणधर के नर्तन को, हलधर के भाई कम हैं। हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|संस्कृतियों की प्राचीन धरा पर, देख राजनीति का अंधपतन। सोच दुर्दशा आम जन-जन की , ब्याकुल-ब्यथित-द्रवित है मन। मोहित अर्जुन को समझाने को , गीता की वाणी कम है। हिमगिरि की ऑंखें नम है।सूर्य भारत भू के जो हैं, अस्ताचल को अग्रसर हैं, गहन तम के नए प्रवर्तक , निष्कंटक प्रभावान प्रखर हैं। दमन शोषण के दो पाटों में…See More
Jun 21
Neelam Upadhyaya commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"आदरणीय मोहित मिश्रा जी नमस्कार।  अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें।  माननीय समर कबीर साहब की अभ्युक्तियों का संज्ञान लें। "
Jun 20

Profile Information

Gender
Male
City State
allahabad
Native Place
allahabad univercity
Profession
student
About me
SIDHA SADA AUR SULJHA HUA

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At 10:14pm on November 28, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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Mohit mishra (mukt)'s Blog

मेरे प्यार!

उस रात रह गया,

दिये की थरथराती लौ पर,

काँपता सुबकता हमारा प्यार

स्याह निशा की स्तब्धता-

थी छा गयी तेरे मेरे दरम्यान,

निगल लिया था अंधकार ने-

हमारे कितने किरण-पुंज,

अविरल अश्रु-प्रवाह के बीच,

थे ब्याकुल तुम, विक्षिप्त मैं ,

और साँसों की ऊष्णता से,

थी घुटती हवा हमारे आस-पास,

वेदना-संतप्त मस्तिष्क में ,

गुंजित थे तुम्हारे भीगे-भीगे शब्द,

जो डबडबाई आँखों समेत-

मुँह मोड़ कर तुमने कहा था ,

“यह मिलन आख़िरी…

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Posted on July 17, 2018 at 11:00pm — 2 Comments

अब मिटा दो पास आओ:-मोहित मुक्त

कह रही है दिल की धड़कन, कुछ दिनों से दूर हो तुम,

आह सांसों की, तड़प की, अब मिटा दो पास आओ.

यह अकेलापन मुझे अब काटने को दौड़ता है ,

तन्हा पल की इस चुभन को अब मिटा दो पास आओ.

आलिंगनों के द्वार तुमसे ,कह रहे हैं खोल बाहें,

फूल के श्रृंगार जैसे गोद मेरी तुम सजा दो ,

आंख के अरमान तुमसे कह रहे हैं इंगितों से ,

देख लो तिरछी नजर से औ जरा सा तुम लजा दो ,

होठ जो प्यासे हैं अबतक बोलते हैं सुन लो सजनी ,

तुम जरा सा होठ अपने मेरे होठों से…

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Posted on July 2, 2018 at 6:27pm — 4 Comments

हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

पुनः कुठाराघात सह रहीं,

माँ भारती कुछ वर्षों से ।

पीड़ादायी दंश दे रहे ,

नवल विषधर कुछ अरसे से।

फण पर फणधर के नर्तन को,

हलधर के भाई कम हैं।

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

संस्कृतियों की प्राचीन धरा पर,

देख राजनीति का अंधपतन।

सोच दुर्दशा आम जन-जन की ,

ब्याकुल-ब्यथित-द्रवित है मन।

मोहित अर्जुन को समझाने को ,

गीता की वाणी कम है।

हिमगिरि की ऑंखें नम है।

सूर्य भारत भू के…

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Posted on June 18, 2018 at 6:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त

अभी भी तुमसे मिलने के कई अरमान बाक़ी हैं ,

मेरी आबादियों के अब तलक निशान बाक़ी हैं।

मैं नंगे पैर शोलों पर अभी भी चल रहा लेकिन ,

मेरे पांवों के छालों में हलक तक जान बाक़ी है।

गले में कस गयीं हैं रस्सियाँ फांसी के फंदे की ,

मगर जिन्दा हूँ क्योंकि मौत का फर्मान बाक़ी है।

फ़क़त कुछ धुप से माना कि मैं सूखता समंदर हूँ ,

मगर अश्कों की बूंदों में बहुत अहजान बाक़ी हैं।

भले ही खाक में मिलने लगा है आसियाँ मेरा…

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Posted on June 10, 2018 at 10:16pm — 6 Comments

 
 
 

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