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Mohit mukt
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गिरिराज भंडारी commented on Mohit mukt's blog post अरे पगली (याचना} (कविता ):- मोहित मुक्त
"आदरनीय मोहित भाई , प्रेम भाव से ओत प्रोत कविता के लिये बधाई । शब्दों की वर्तनी का ख्याल कीजिये ... मज़ा कम होता है ।"
4 hours ago
Mohit mukt commented on Rahila's blog post ससुराल की पहली होली(हास्य कविता)राहिला
"आदरणीया  राहिला जी मैं ज्यादा technically तो नहीं जानता पर हो गयी शुरू ,रात से होली ,इधर अकेले ,उधर हुल्लड़ टोली,की जगह। ...... हो गयी शुरू ,रात से होली ,इत अकेले ,उत हुल्लड़ टोली,होता तो मजा दुगना हो जाता. परंतु यह मेरी राय है और मैं खुद आपके…"
yesterday
Mohit mukt commented on Mohit mukt's blog post ना जाने दिल क्यों खोजता है (कविता):- मोहित मुक्त
"आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी रचनावलोकन और प्रोत्साहन के लिए तहे दिल से शुक्रिया "
yesterday
Mohit mukt commented on Rahila's blog post ससुराल की पहली होली(हास्य कविता)राहिला
"आदरणीया राहिला जी मन को गुदगुदाती सुन्दर रचना  इसकी दूसरी पंक्ति फिर देख लीजिए  हो गयी शुरू ,रात से होली ,इधर अकेले ,उधर हुल्लड़ टोली,"
yesterday
Mohit mukt commented on Mohit mukt's blog post क्या कभी अरमानो को ,सीने में कुचला है आपने (कविता):-मोहित मुक्त
"आदरणीय mohammedarif ji आदाब रचना पर उपस्थिति और बधाई के लिए शुक्रिया "
yesterday

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गिरिराज भंडारी commented on Mohit mukt's blog post ना जाने दिल क्यों खोजता है (कविता):- मोहित मुक्त
"आदरनीय मोहित भाई , अच्छी भाव पूर्ण कविता रची है .... हार्दिक बधाई ।"
yesterday
Mohammed Arif commented on Mohit mukt's blog post क्या कभी अरमानो को ,सीने में कुचला है आपने (कविता):-मोहित मुक्त
"आदरणीय मोहित मुक्त जी आदाब,बहुत सुंदर अशआर । बधाई स्वीकार करें ।"
Tuesday
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Tuesday
Mohit mukt commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल -तड़प तड़प के क्यूँ वो बाहर निकले हैं - ( गिरिराज )
"आदरणीय गिरिराज जी हमेसा की तरह अति सुन्दर ग़ज़ल बाहर दवा छिड़क भी लें तो क्या होगा इंसाँ  दीमक जैसे अन्दर निकले हैं   अपनी गलती बून्दों सी दिखलाये, पर् जब नापे तो सारे सागर निकले हैं वाह क्या ख़ूब कही आपने"
Tuesday
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क्या कभी अरमानो को ,सीने में कुचला है आपने (कविता):-मोहित मुक्त

क्या कभी अरमानो को, सीने में कुचला है आपने ?जब मन उड़ता रहे आकाश में , जब उमंग हो हर साँस में , जब दिल मल्हार गाता रहे , जब स्वप्न पटल पर छाता रहे , क्या जज्बातों को तब , पैरों तले मसला है आपने ? क्या कभी अरमानो को, सीने में कुचला है आपने ?प्रजा के ब्यङ्ग बाणों से आहत , कुचल स्वामी के संग की चाहत , जैसे राजरानी बन को चले , जैसे श्रीराम को मर्यादा छले , क्या कभी खुद को खुद से, वैसे हीं छला है आपने ? क्या कभी अरमानो को ,सीने में कुचला है आपने ?मुरली की मीठी तान थी वो , दिल की प्यारी अरमान थी वो,…See More
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भोजपुरी साहित्य

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Monday
Mohit mukt left a comment for विश्वजीत विद्यालंकार
Monday
Mohit mukt commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी  शेर दर शेर दाद के साथ दिल छूती ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई "
Monday
Mohit mukt commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (निगाहों से आँसू निकलते रहे )
" आदरणीय  Tasdiq Ahmed Khan बहुत सुन्दर ग़ज़ल प्रस्तुत की है आपने हार्दिक बधाई"
Monday

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SIDHA SADA AUR SULJHA HUA

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At 10:14pm on November 28, 2016,
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मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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क्या कभी अरमानो को ,सीने में कुचला है आपने (कविता):-मोहित मुक्त

क्या कभी अरमानो को, सीने में कुचला है आपने ?

जब मन उड़ता रहे आकाश में ,

जब उमंग हो हर साँस में ,

जब दिल मल्हार गाता रहे ,

जब स्वप्न पटल पर छाता रहे ,

क्या जज्बातों को तब , पैरों तले मसला है आपने ?

क्या कभी अरमानो को, सीने में कुचला है आपने ?

प्रजा के ब्यङ्ग बाणों से आहत ,

कुचल स्वामी के संग की चाहत ,

जैसे राजरानी बन को चले ,

जैसे श्रीराम को मर्यादा छले ,

क्या कभी खुद को खुद से, वैसे हीं छला है आपने ?

क्या कभी…

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Posted on March 21, 2017 at 12:00am — 2 Comments

अरे पगली (याचना} (कविता ):- मोहित मुक्त

अरे पगली तुझसे मोहब्बत करता हूं मैं|

लौट के आज न बहो में , तड़पती है क्यूँ|

अब रूठ के मुझसे ,सताती है क्यूँ |

पहले मेरे उदासी पर रो देती थी तू,

आज मुह फेर के मुझको रुलाती है क्यूँ |

आज भी तुझे खोने से डरता हूं मैं |

अरे पगली तुझसे मोहब्बत करता हूं मैं|

मेरी शैतानी भरी बातों पर मुझको डाँटेगा कौन,

अपना सुख दुःख मेरे साथ बांटेगा कौन,

गम के झंझावातो में किसके पास जाऊंगा मैं,

ख़ुशी में भर बांहो में किसे उठाऊंगा…

Continue

Posted on March 19, 2017 at 9:22am — 3 Comments

ना जाने दिल क्यों खोजता है (कविता):- मोहित मुक्त

ना जाने दिल क्यों ढूंढता है|

वो खुशबु तेरे बालों की,

वो लाली तेरे गालों की,

दृग कजरारे तेज कटार से ,

लब पगे है जो रसधार से,

चंचल मीठी मुस्कान को ,

ज्यो साधु खोजे भगवन को ,

तुम ईष्ट हो या प्रेयसी,

मन दो पल रुक से सोचता है|

ना जाने दिल क्यों ढूंढता है|

वो लम्हे कितने प्यारे थे,

आप जो साथ हमारे थे,

थोड़ी बहुत ख़ामोशी थी,

बस पत्तों की सरगोशी थी,

जब सांसे अपनी टकराती थी,

क्या अदा से तुम शर्माती…

Continue

Posted on March 18, 2017 at 9:36am — 8 Comments

 
 
 

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"आदरणीय वासुदेव भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।"
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गिरिराज भंडारी commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल -तड़प तड़प के क्यूँ वो बाहर निकले हैं - ( गिरिराज )
"आदरणीय वासुदेव भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।"
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गिरिराज भंडारी commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल....अब कहाँ गुम हुये आसरे भीड़ में
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