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Kalipad Prasad Mandal
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Kalipad Prasad Mandal posted a blog post

ग़ज़ल-ये'  माया मोह का  चक्कर है’ कैसे काटे’ बंधन को|

काफिया :अन ; रदीफ़ : कोबहर : १२२२  १२२२  १२२२  १२२२अलग अलग बात करते सब, नहीं जाने ये' जीवन कोये'  माया मोह का  चक्कर है’ कैसे काटे’ बंधन को|किए  आईना’दारी मुग्ध  नारी जाति  को जग मेंनयन मुख के  सजावट  बीच भूले  नारी’ कंगन को |सुधा रस  फूल का पीने दो’ अलि  को पर कली को छोड़कली को नाश कर अब क्यों उजाड़ो पुष्प गुलशन को|बदी की है वही जिसके लिए हमने दुआ माँगीन ईश्वर दोस्त ऐसे दे मुझे या मेरे दुश्मन को |निगाह तेरी बड़ी पैनी  मेरे  दिल  छेद डाली हैजिगर  है खूंचकाँ मेरे सँभालो नज्र सोजन को |धरा पर है अभी…See More
36 minutes ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं=कालीपद 'प्रसद'
"अच्छी लगी ग़ज़ल आदरणीय शिल्प पक्ष पे तो गुणीजन राय देंगे।सादर"
Saturday
Kalipad Prasad Mandal posted a blog post

ग़ज़ल -महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं=कालीपद 'प्रसद'

काफिया : अम   रदीफ़: देखते हैंबह्र : १२२  १२२  १२२  १२२महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैंअधम लोग उसका, जनम देखते हैं |बहुत है दुखी कौम  गम देखते हैंसुखी कौम गम को तो’ कम देखते हैं |अतिथि मुल्क में जो भी’ आये यहाँ पर  मनोहर बियाबाँ, इरम देखते है |दिशा हीन सब नौजवान और करते क्यावज़ीरों के’ नक़्शे कदम देखते हैं |किया देश हित काम जनता ही’ देखेविपक्षी तो’ केवल सितम देखते हैं |तमाशा वही फ़क्त आईना’ दारीवही “काली’” तस्वीर हम देखते हैं |बियाबाँ=कानन, जंगलइरम=स्वर्ण भूमिआईना’दारी=आत्म श्रिंगार मौलिक और…See More
Friday
Mohammed Arif commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं=कालीपद 'प्रसद'
"आदरणीय कालीपद प्रसाद जी आदाब,                            अच्छी ग़ज़ल का प्रयास । ग़ज़ल अभी और समय चाहती है । दूसरे शे'र के उला और सानी दोनों मिसरों में तथा तीसरे शे'र में भी…"
Wednesday
Kalipad Prasad Mandal commented on SALIM RAZA REWA's blog post तू अगर बा - वफ़ा नहीं होता - सलीम रज़ा रीवा
"आ सलिन रज़ा जी  | ग़ज़ल बहुत उम्दा बनी  है , मुबारक बाद कुबूल करें |"
Wednesday
Kalipad Prasad Mandal commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की--ये अजब क़िस्सा रहा है ज़िन्दगी में
"सोचने के वक़्त तुम को सोचता हूँ और बाक़ी कट रही है नौकरी में.  .लुत्फ़ मिलता है बहुत ग़मगीन रहकरजैसे कुछ बाक़ी नहीं हो ज़िन्दगी में   , ऐसे सभी शेर अच्छे है , ये दोनों अभूत अछे लगे  मुबारक बाद कुबूल कीजिये  निलेश…"
Wednesday
Kalipad Prasad Mandal posted a blog post

ग़ज़ल -महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं=कालीपद 'प्रसद'

काफिया : अम   रदीफ़: देखते हैंबह्र : १२२  १२२  १२२  १२२महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैंअधम लोग उसका, जनम देखते हैं |बहुत है दुखी कौम  गम देखते हैंसुखी कौम गम को तो’ कम देखते हैं |अतिथि मुल्क में जो भी’ आये यहाँ पर  मनोहर बियाबाँ, इरम देखते है |दिशा हीन सब नौजवान और करते क्यावज़ीरों के’ नक़्शे कदम देखते हैं |किया देश हित काम जनता ही’ देखेविपक्षी तो’ केवल सितम देखते हैं |तमाशा वही फ़क्त आईना’ दारीवही “काली’” तस्वीर हम देखते हैं |बियाबाँ=कानन, जंगलइरम=स्वर्ण भूमिआईना’दारी=आत्म श्रिंगार मौलिक और…See More
Wednesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं-कालीपद 'प्रसाद'
"प्रयास के लिए हार्दिक बधाई।"
Jan 16
Kalipad Prasad Mandal commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं-कालीपद 'प्रसाद'
"आ सुरेन्द्र नाथ सिंह जी , ग़ज़ल पर शिरकत करने केलिए तहे दिल से शुक्रिया |"
Jan 15
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं-कालीपद 'प्रसाद'
"आद0 कालीपद प्रसाद जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का बढ़िया प्रयास हुआ है, तथापि ग़ज़ल सा उतना सटीक बन नहीं पाया है। आपको इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई। सादर"
Jan 15
Kalipad Prasad Mandal commented on surender insan's blog post ग़ज़ल "ऐसे भी माहौल बनाया जाता है"
"आ अजय तिवारी जी ,नमन , फैलुन( २२ ) का २११ का प्रयोग तो समझमे आगया , कृपया २२ का ११२ या १२१ के रूप में कहाँ प्रयोग होता है एल उदाहरण दे\ सादर "
Jan 14
Kalipad Prasad Mandal commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़ज़ल- मिला कुछ नहीं जाँच पड़ताल में।
"आ राम अवध जी , गज़की प्रयास अच्छी हुई है |बधाई कुबूल करें "
Jan 14
Kalipad Prasad Mandal commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं-कालीपद 'प्रसाद'
"इस ग़ज़ल में कहाँ कहाँ शिल्प एवं व्याकरण की गलती है , इशारे करदेते तो मुझे सुधरने में आसानी होतो आदरणीय |मैं ९९% हिंदी शब्द का प्रयोग करता हूँ | अक्सर काफिया शब्द ही उर्दू के चयनित शब्द होते हैं |सादर आदाब "
Jan 14
Kalipad Prasad Mandal commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं-कालीपद 'प्रसाद'
"आदरणीय समर कबीर जी आदाब | भाषा शिल्प व्याकरण के लिए मझे  किन किन शायरों को पढना चाहिए |उनकी कोई विशेष शायरी की किताब हो तो कृपया बताएं |सादर "
Jan 14
Kalipad Prasad Mandal commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं-कालीपद 'प्रसाद'
"आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी ,आदाब ,हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया |सादर "
Jan 14
Samar kabeer commented on Kalipad Prasad Mandal's blog post ग़ज़ल -हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं-कालीपद 'प्रसाद'
"जनाब कालीपद प्रसाद मण्डल जी आदाब,ग़ज़ल अभी बहुत समय चाहती है,भाषा,शिल्प,व्याकरण पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है,और इसके लिए आपको पुराने शायरों का कलाम बहुत पढ़ना होगा ।"
Jan 14

Profile Information

Gender
Male
City State
Pune
Native Place
Pune
Profession
Retired Principal, Writer, Poet
About me
Writer of "Value Based Education" published in 2000, two kavita sangrah Published ,!. Kavya saurabh" 2. "Andhere se ujaale ki or" writer of Haiku and Tanka (Japaani vidha),Write tukant ,atukant poem , ,dohe,muktak, learning gaza writingt

ओ बी ओ तरही ....-----71

सारी सारी रात जग जिन के लिए 

पूछते वे जागरण किन के लिए |1|

चाँद तारों तो  झुले  हैं  रात में 

एक सूरज को रखा दिन के लिए |२|

आसान नहीं भूलना यूँ भूत को 

आज तक तो मोह है इन के लिए |३|

रात भर आँसू कभी थमती नहीं  

अश्रु जल यूँ लुडकते किन के लिए|४ |

वो सुखी हैं या दुखी किस को पता

फूल जंगल में खिले किन के लिए |५|

जानते थे हम जुदा होंगे कभी 

क्या जतन करते कभी इन के लिए |६|

अब इन्हें संसार में आना नहीं 

कौन रोये इस जहाँ इन के लिए |७|

वो कभी पीड़ा समझना चाहती 

क्लेश हम पीते गए जिनके लिए |८|

मौलिक और अप्रकाशित 

 

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ग़ज़ल-ये'  माया मोह का  चक्कर है’ कैसे काटे’ बंधन को|

काफिया :अन ; रदीफ़ : को

बहर : १२२२  १२२२  १२२२  १२२२

अलग अलग बात करते सब, नहीं जाने ये' जीवन को

ये'  माया मोह का  चक्कर है’ कैसे काटे’ बंधन को|

किए  आईना’दारी मुग्ध  नारी जाति  को जग में

नयन मुख के  सजावट  बीच भूले  नारी’ कंगन को |

सुधा रस  फूल का पीने दो’ अलि  को पर कली को छोड़

कली को नाश कर अब क्यों उजाड़ो पुष्प गुलशन को|

बदी की है वही जिसके लिए हमने दुआ माँगी

न ईश्वर दोस्त ऐसे दे मुझे या मेरे…

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Posted on January 23, 2018 at 11:02am

ग़ज़ल -महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं=कालीपद 'प्रसद'

काफिया : अम   रदीफ़: देखते हैं

बह्र : १२२  १२२  १२२  १२२

महात्मा जो हैं, वो करम देखते हैं

अधम लोग उसका, जनम देखते हैं |

बहुत है दुखी कौम  गम देखते हैं

सुखी कौम गम को तो’ कम देखते हैं |

अतिथि मुल्क में जो भी’ आये यहाँ पर  

मनोहर बियाबाँ, इरम देखते है |

दिशा हीन सब नौजवान और करते क्या

वज़ीरों के’ नक़्शे कदम देखते हैं |

किया देश हित काम जनता ही’ देखे

विपक्षी तो’ केवल सितम देखते हैं…

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Posted on January 17, 2018 at 11:30am — 2 Comments

ग़ज़ल -हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं-कालीपद 'प्रसाद'

काफिया : आद ; रदीफ़ :नहीं

बहर : २१२२  २१२२  २१२२  २२(११२)

हुक्म की तामील करना कोई’ बेदाद नहीं

बादशाही सैनिकों से कोई’ फ़रियाद नहीं |

“देशवासी की तरक्की हो” पुराना नारा

है नई बोतल, सुरा में तो ईजाद नहीं |

भक्त था वह, मूर्ति पूजा की लगन से उसने

द्रौण से सीखा सही वह, द्रौण उस्ताद नहीं |

देश है आज़ाद, हैं आज़ाद भारतवासी

किन्तु दकियानूसी’ धार्मिक सोच आज़ाद नहीं |

लूटने का मामला…

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Posted on January 13, 2018 at 9:41am — 8 Comments

ग़ज़ल -चहरा छुपा रखा है’ सनम ने नकाब में- कालीपद 'प्रसाद'

काफिया : आब ; रदीफ़ : में

बहर : २२१  २१२१  १२२१  २१२

चहरा छुपा रखा है’ सनम ने नकाब में

मुहँ बंद किन्तु भौंहे’ चड़ी हैं इताब में |

इंसान जो अज़ीम है’ बेदाग़ है यहाँ  

है आग किन्तु दाग नहीं आफताब में |

जाना नहीं है को’ई भी सच और झूठ को

इंसान जी रहे हैं यहाँ’ पर सराब में  |

इंसां में’ कर्म दोष है’, जीवात्मा’ में नहीं

है दाग चाँद में, नहीं’ वो ज्योति ताब में |

मदहोश जिस्म और नशीले…

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Posted on January 8, 2018 at 10:00am — 8 Comments

Comment Wall (8 comments)

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At 10:57pm on September 27, 2016, Samar kabeer said…
जनाब कालीपद प्रसाद जी आदाब,इस बह्र के अरकान होते हैं :-

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

आप इसलिये अटक रहे हैं कि आपने मात्रा नहीं गिराई है,मात्रा गिराकर देखेंगे तो सही नतीजे पर पहुँच जाऐंगे ।
At 11:32pm on July 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

कालीपद प्रसाद मंडल जी,

सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 7:27pm on July 8, 2016, pratibha pande said…

आपको जन्म दिन की ढेरों शुभकामनाएँ .. 

At 3:45pm on June 22, 2016, सुरेश कुमार 'कल्याण' said…
आदरणीय श्री काली प्रसाद मंडल जी आपको कविता पसंद आई हार्दिक धन्यवाद।
At 8:05pm on June 21, 2016, Sheikh Shahzad Usmani said…
सादर हार्दिक आभार अवसर प्रदान करने के लिए। सभी विधाओं सहित जापानी काव्य विधाओं में मेरे लेखन अभ्यास में आपसे भी कुछ सीखने को मिलता रहेगा।
At 11:46pm on May 21, 2016, Kalipad Prasad Mandal said…

स्वागत के लिए धन्यवाद मिथिलेश जी ! जन्म दिन की बधाई आपने दी उसे भी सधन्यवाद स्वीकार करता हूँ क्योकि जन्मदिन मेरा भाई का है मेरा नहीं | सुबह मैंने दोहा पोस्ट किया था वो मुझे कहां दिखाई देगा ?

At 11:55am on May 16, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 1:11pm on May 11, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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