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BS Gauniya
  • 30, Male
  • Nainital (Uttarakhand)
  • India
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Afroz 'sahr' commented on BS Gauniya's blog post देखो कैसे-कैसे गीत...
"आदरणीय गुनिया जी भाव अच्छे हैं पर विधा कौन सी है में समझ ना सका,,,"
Oct 11, 2017
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on BS Gauniya's blog post देखो कैसे-कैसे गीत...
"यह किस विधा में लिखा है आदरणीय ? सादर |"
Oct 11, 2017
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on BS Gauniya's blog post देखो कैसे-कैसे गीत...
"बहुत ही सुन्दर गीत हुआ आदरणीय..हार्दिक बधाई"
Oct 10, 2017
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on BS Gauniya's blog post देखो कैसे-कैसे गीत...
"आद0 बी एस गुनिया जी सादर अभिवादन, अच्छा लिखा है आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई। अगर आप विधा भी लिख दें तो हमे प्रतिक्रिया देने में आसानी होंगीं। सादर"
Oct 9, 2017
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on BS Gauniya's blog post देखो कैसे-कैसे गीत...
"आद0 बी एस गुनिया जी सादर अभिवादन, अच्छा लिखा है आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई। अगर आप विधा भी लिख दें तो हमे प्रतिक्रिया देने में आसानी होंगीं। सादर"
Oct 9, 2017
Samar kabeer commented on BS Gauniya's blog post देखो कैसे-कैसे गीत...
"जनाब बी एस गौनिया जी आदाब,पहली बार आपकी रचना पढ़ रहा हूँ,बहुत सुंदर गीत लिखा आपने,क्या ये नवगीत है?,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Oct 8, 2017
BS Gauniya posted a blog post

देखो कैसे-कैसे गीत...

बिन पायल के,साज बिना ये,बाज रहा संगीत।देखो कैसे-कैसे गीत।।राग बसंती, तान-तरानेसुमधुर गायन सकल घराने।ये सोच रहा अनजाने,मेरे ही मनमीत।देखो कैसे-कैसे गीत।।सांझ-सबेरे प्रियतम मेरेतरसाओ न चित-चोर चितेरे।नयना बरसे अश्रु मेरे,बिन प्रियतम ये प्रीत।देखो कैसे-कैसे गीत।।मधुबन की ये संगत सारीबिन पायल सब बाजी हारी।अब कौन कहे मतवारी,हारकर ये जीत।देखो कैसे-कैसे गीत।।"मौलिक व अप्रकाशित" See More
Oct 8, 2017

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on BS Gauniya's blog post वो तुम थी....
"आदरणीय गौनिया जी , अच्छी कविता हुई है , बधाइयाँ । आ. समर भाई जी की बातों से सहमत हूँ ।"
Sep 13, 2017
Mohammed Arif commented on BS Gauniya's blog post वो तुम थी....
"प्रिय बीएस गौनिया जी आदाब, अच्छी रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । गुणीजनों की बातों का संज्ञान लें ।"
Sep 12, 2017
BS Gauniya commented on BS Gauniya's blog post वो तुम थी....
" आभार "
Sep 12, 2017
Mahendra Kumar commented on BS Gauniya's blog post वो तुम थी....
"अच्छी भावाभिव्यक्ति है आ. बीएस गौनिया जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए और आ. समर सर की बातों का संज्ञान लीजिए. सादर."
Sep 11, 2017
Samar kabeer commented on BS Gauniya's blog post वो तुम थी....
"जनाब बीएस गौनिया जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । 'वो तुम थी' को "वो तुम थीं" कर लें । 'लफ़्ज़ अल्फ़ाज़ भी सब तुम्हारे' इस पंक्ति में 'अल्फ़ाज़'शब्द 'लफ़्ज़'का बहुवचन है, इसलिये…"
Sep 11, 2017
BS Gauniya posted a blog post

वो तुम थी....

मेरे घर, मेरे शहर, मेरे लफ्जों को एक आहट सी लगी, कि कोई उन्हें छूकर चला गया..  वो ठंडी सी छुवन,  एक भंवर सी कम्पन...  लगा पहाड़ों से कोई  मंदाकिनी आ गयी..  लगा मेरे लफ्जों को,  एक आवाज सी मिल गयी..  जैसे मेरे गीतों को,  कोई छूकर चला गया...  उन्हें कहें भी, क्या कहें.. किस हक़ से कहें ? कि दीदार तो जरूरी था.. इन्तजार तो जरूरी था, या वो ऐतबार भी जरूरी था..  जैसे मेरा कोई अपना हो, जो छूकर चला गया...  चलो मान ली बातें तुम्हारी, सुन ली शिकायतें सारी..  लफ्ज,अल्फाज भी सब तुम्हारे, किरदार भी…See More
Sep 11, 2017
BS Gauniya updated their profile
Aug 16, 2017
BS Gauniya is now a member of Open Books Online
Jul 29, 2017

Profile Information

Gender
Male
City State
Nainital
Native Place
Nainital
Profession
Journalism
About me
बेशक, बेकदर हम नही हैं दोस्तो, इज्जतदार भी तो नहीं. किसी पैमाइस ने भले ही जांचा न हो, मगर इतने दागदार भी नहीं...

BS Gauniya's Blog

देखो कैसे-कैसे गीत...

बिन पायल के,

साज बिना ये,

बाज रहा संगीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।



राग बसंती, तान-तराने

सुमधुर गायन सकल घराने।

ये सोच रहा अनजाने,

मेरे ही मनमीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।



सांझ-सबेरे प्रियतम मेरे

तरसाओ न चित-चोर चितेरे।

नयना बरसे अश्रु मेरे,

बिन प्रियतम ये प्रीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।



मधुबन की ये संगत सारी

बिन पायल सब बाजी हारी।

अब कौन कहे मतवारी,

हारकर ये जीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।

"मौलिक व…

Continue

Posted on October 8, 2017 at 8:15am — 6 Comments

वो तुम थी....

मेरे घर, मेरे शहर, मेरे लफ्जों को

एक आहट सी लगी,

कि कोई उन्हें छूकर चला गया.. 



वो ठंडी सी छुवन, 

एक भंवर सी कम्पन... 

लगा पहाड़ों से कोई 

मंदाकिनी आ गयी.. 

लगा मेरे लफ्जों को, 

एक आवाज सी मिल गयी.. 

जैसे मेरे गीतों को, 

कोई छूकर चला गया... 



उन्हें कहें भी,

क्या कहें..

किस हक़ से कहें ?

कि दीदार तो जरूरी था..

इन्तजार तो जरूरी था,

या वो ऐतबार भी जरूरी था.. 

जैसे मेरा कोई अपना हो,

जो छूकर चला…

Continue

Posted on September 10, 2017 at 2:00pm — 5 Comments

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