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Arun Sri
  • 31, Male
  • U.P.
  • India
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Arun Sri replied to Admin's discussion खुशिया और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"इस स्नेह के लिए बहुत धन्यवाद सर ! :-))"
Oct 1, 2014
Arun Sri and Sulabh Agnihotri are now friends
Sep 17, 2014
Arun Sri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक - 47
"//गुम हुई संज्ञाओं की निर्निमेष आँखों में, कहते हैं, असहायपन हुआ करता है. किन्तु यह किसी अकर्मण्य की विमूढ़ता नहीं होती, बल्कि व्यवहार में लगातार अशक्त होते चले जाने की पीड़ा हुआ करती है//मुझे अचम्भा होता है कि कैसे आप कविता की व्याख्या करते-करते मेरी…"
Sep 13, 2014
Arun Sri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक - 47
"बहुत धन्यवाद सर ! "
Sep 13, 2014
Arun Sri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक - 47
"मैं इसे अपना सौभाग्य कहूँगा ! सादर ! "
Sep 13, 2014
Arun Sri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक - 47
"धन्यवाद सर ! "
Sep 13, 2014
Arun Sri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक - 47
"आयोजन की रचनाएँ पढते-पढते आखिर मैंने भी लिख ही लिया कविता जैस कुछ  :-))))  -- ..समय की पीठ पर बैठ पुराने समय की कुछ स्मृतियाँ - न जाने किस समय की चली पहुंची हैं मेरे समय तक ! उनका स्वागत करने से पहले - मैं डरता हूँ कि कोई राजाज्ञा तो नहीं…"
Sep 13, 2014
Arun Sri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक - 47
"हर इक युग में सलीबों पर मिलेगा  मसीहा झूठ को ढोता नहीं है वो पत्थर तानता है आइने पर  मगर चेहरा कभी धोता नहीं हैकमाल के अश'आर ! बेहतरीन ! मुग्ध हूँ इस गज़ल पर ! वाह !"
Sep 13, 2014
Arun Sri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक - 47
"//न्याय देरी से मिला, क्या  फाइदा आप भी  तो  देखिये ये सोच कर//"
Sep 13, 2014
Arun Sri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक - 47
"बेहतरीन छंद ! अच्छा लगा पढकर !"
Sep 13, 2014
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on Arun Sri's blog post कोई क्रन्तिकारी नहीं हूँ मैं -- अरुण श्री !
"आदरणीय  अरुण जी आपकी कविता का मुझे सदैव इन्तेजार रहता है i देर से आती है पर जब भी आती है उस दर्द  का अहसास करती है जो हमें पता तो है पर उसकी शिद्दत हम महसूस करने से कतराते  है i प्रशांत फिलीस्तीनी  माँ और…"
Sep 6, 2014

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Arun Sri's blog post कोई क्रन्तिकारी नहीं हूँ मैं -- अरुण श्री !
"खींच लेते हैं ,शब्द शब्द , बरबस ही गहरे से और गहरे उतने गहरे में , जितना  स्वयं कभी गया नहीं बहते  खिंचते  , साँसे टूट टूट जातीं हैं दम फूल जाता है , छटपटा जाता हूँ शब्द गूंगे से , चेहरे की रेखाओं में मानी तलाशते खो जाते…"
Sep 5, 2014

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Arun Sri's blog post बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !
"//मैंने लिखा है कि "एक समय तलवार से महत्वपूर्ण हो जातीं है दरातियाँ" ! ये किसी का नकार नहीं है बल्कि परिस्थिति विशेष में प्राथमिकताओं का निर्धारण मात्र कई किसी शासक के लिए ! //बहुत खूब ! ’एक समय’ के श्लेषात्मक प्रयोग ने मुग्ध…"
Aug 4, 2014
Arun Sri commented on Arun Sri's blog post बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !
"MAHIMA SHREE जी , दुआ कीजिए कि मैं इसी तरह प्रभावित करता रहूँ आपको , सबको ! धन्यवाद ! :-)))"
Aug 4, 2014
Arun Sri commented on Arun Sri's blog post बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !
"विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी भाई , बहुत-बहुत धन्यवाद आपको ! "
Aug 4, 2014
Arun Sri commented on Arun Sri's blog post बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !
"Saurabh Pandey सर , आपके इस विस्तृत वार्तालाप ने मुझे ठीक वहीँ पहुंचा दिया जहाँ से मैंने इस कविता को लिखा था ! शायद इसी को कहते होंगे कविता का जी उठाना ! बाकी आपके एक प्रश्न पर कि "क्या कवि राष्ट्रधर्म के इतर चैतन्य होने की बात करता है ?"…"
Aug 4, 2014
MAHIMA SHREE commented on Arun Sri's blog post बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !
"क्योकि - मैं कई बार शब्दों को चबाकर लहूलुहान कर देता हूँ ! खून टपकती कविताएँ कपड़े उतार ताल ठोकतीं हैं ! स्थापित देव मुझे ख़ारिज करने के नियोजित क्रम में - अपना सफ़ेद पहनावा सँभालते हैं पहले ! सतर्क होने की स्थान पर सहम जातीं हैं सभ्यताएँ ! पत्ते झड़ने…"
Aug 3, 2014

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Arun Sri's blog post बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !
"कोई कविता जब बतियाती है तो संवेदनशील कवि और जागरुक समाज दोनों एक साथ सुनते हैं. यही संवेदना तथा जागरुकता की कसौटी है. पारस्परिक अभिव्यक्तियों का सबसे सुगढ़ पक्ष श्रवण, मनन और तब संप्रेषण है. अन्यथा कविताएँ मात्र बोलती हुई इकाइयों की तरह सामने आती…"
Aug 3, 2014
विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी commented on Arun Sri's blog post बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !
"आदरणीय अरुण भाई जी! सुंदर रचना। आपके काव्य बिम्ब और उनकी अपील हृदय को छू रहे हैं। यही किसी रचना और रचनाकार की सफलता है। बधाई भाई।"
Aug 3, 2014
savitamishra commented on Arun Sri's blog post बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !
"गूढता इतनी जल्दी समझ जाते तो कवियों की कतार में हम ना खड़े होते क्या भाई ...असफलता आपकी नहीं हमारी ही समझ कम है जरा"
Jul 30, 2014

Profile Information

Gender
Male
City State
Mughalsarai
Native Place
Kalani , Ramgarh(Kaimur)
Profession
Accountant
About me
रण में कुटिल काल सम क्रोधी .............. तप में महासूर्य जैसा !

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बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !

मैं चाहता हूँ कि बिल्ली सी हों मेरी कविताएँ !

 

क्योकि -

युद्ध जीत कर लौटा राजा भूल जाता है -

कि अनाथ और विधवाएँ भी हैं उसके युद्ध का परिणाम !

लोहा गलाने वाली आग की जरुरत चूल्हों में है अब !

एक समय तलवार से महत्वपूर्ण हो जातीं है दरातियाँ !

 

क्योंकि -

नई माँ रसोई खुली छोड़ असमय सो जाती है अक्सर !

कहीं आदत न बन जाए दुधमुहें की भूख भूल जाना !

कच्ची नींद टूट सकती है बर्तनों की आवाज से भी ,

दाईत्वबोध पैदा कर सकता…

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Posted on July 28, 2014 at 10:47am — 24 Comments

अजन्मी उम्मीदें --- अरुण श्री

समय के पाँव भारी हैं इन दिनों !

 

संसद चाहती है -

कि अजन्मी उम्मीदों पर लगा दी जाय बंटवारे की कानूनी मुहर !

स्त्री-पुरुष अनुपात, मनुस्मृति और संविधान का विश्लेषण करते -

जीभ और जूते सा हो गया है समर्थन और विरोध के बीच का अंतर !

बढती जनसँख्या जहाँ वोट है , पेट नहीं !

पेट ,वोट ,लिंग, जाति का अंतिम हल आरक्षण ही निकलेगा अंततः !

 

हासिए पर पड़ा लोकतंत्र अपनी ऊब के लिए क्रांति खोजता है

अस्वीकार करता है -

कि मदारी की जादुई…

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Posted on June 4, 2014 at 10:30am — 10 Comments

आखिर कैसा देश है ये ? --- अरुण श्री

आखिर कैसा देश है ये ?

- कि राजधानी का कवि संसद की ओर पीठ किए बैठा है ,

सोती हुई अदालतों की आँख में कोंच देना चाहता है अपनी कलम !

गैरकानूनी घोषित होने से ठीक पहले असामाजिक हुआ कवि -

कविताओं को खंखार सा मुँह में छुपाए उतर जाता है राजमार्ग की सीढियाँ ,

कि सरकारी सड़कों पर थूकना मना है ,कच्चे रास्तों पर तख्तियां नहीं होतीं !

पर साहित्यिक थूक से कच्ची, अनपढ़ गलियों को कोई फर्क नहीं पड़ता !

एक कवि के लिए गैरकानूनी होने से अधिक पीड़ादायक है गैरजरुरी होना…

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Posted on June 1, 2014 at 1:00pm — 24 Comments

नायक (अरुण श्री)

अपनी कविताओं में एक नायक रचा मैंने !

समूह गीत की मुख्य पंक्ति सा उबाऊ था उसका बचपन ,

जो बार-बार गाई गई हो असमान,असंतुलित स्वरों में एक साथ !

तब मैंने बिना काँटों वाले फूल रोपे उसके ह्रदय में ,

और वो खुद सीख गया कि गंध को सींचते कैसे हैं !

उसकी आँखों को स्वप्न मिले , पैरों को स्वतंत्रता मिली !

लेकिन उसने यात्रा समझा अपने पलायन को !

उसे भ्रम था -

कि उसकी अलौकिक प्यास किसी आकाशीय स्त्रोत को प्राप्त हुई है !

हालाँकि उसे ज्ञात था…

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Posted on April 28, 2014 at 11:00am — 27 Comments

Comment Wall (13 comments)

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At 1:57pm on February 27, 2013, Meena Pathak said…

शुक्रिया अरुन जी 

At 11:54pm on February 22, 2013, बृजेश नीरज said…

आपने मुझे मित्रता योग्य समझा इसके लिए आपका आभार!

At 1:18am on July 5, 2012, deepti sharma said…
shukriya Arun ji
At 11:18am on May 16, 2012, Rekha Joshi said…

jaankaari ke liye dhnyvaad Arun ji 

At 10:44am on May 16, 2012, Rekha Joshi said…

thanks Arun ji ,I am new to this site and have to learn a lot ,please guide me 

At 8:17pm on May 14, 2012, SANDEEP KUMAR PATEL said…

आपका स्वागत है मित्रवर ..................

At 12:58pm on April 1, 2012, PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA said…

आदरणीय , श्री अरुण जी.

सादर अभिवादन.
धन्यवाद.  स्नेह बनाये रखियेगा.
At 5:52am on January 9, 2012, Shanno Aggarwal said…

अजय, आपकी रचनायें बहुत खूबसूरत हैं. बधाई व शुभकामनायें. 

At 1:02pm on January 8, 2012, deepak kumar said…

mujhe ek mitr mila !

At 7:20am on January 6, 2012, आशीष यादव said…
Congrats. Ur creation is month's best creation.
 
 
 

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"ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें.......  "
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मिथिलेश वामनकर left a comment for sundar shaw
"ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें.......  "
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मिथिलेश वामनकर left a comment for Priyanka Tripathi
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vinaya kumar singh commented on vinaya kumar singh's blog post बड़प्पन--
"बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी । आप जैसे संजीदा लेखक से ऐसी टिप्पणी मिलना बहुत सुकून दे…"
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