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डॉ पवन मिश्र
  • Male
  • कानपुर, उ0प्र0
  • India
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KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to डॉ पवन मिश्र's discussion भुजंगप्रयात छन्द in the group धार्मिक साहित्य
"सुंदर भावना | "
Aug 28, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"आदरणीय रवि जी, हृदयतल से आभार आपका"
Feb 10, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"आदरणीय रवि जी, शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल कीजिये। कमाल ग़ज़ल कही है आपने। बधाई स्वीकारें"
Feb 10, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"आदरणीय सुरेश जी, इस उत्साहवर्धन के लिये हृदयतल से आभार"
Feb 10, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"जनाब सतविंद्र जी राणा, इस हौसला आफजाई के लिये तहे दिल से शुक्रिया"
Feb 10, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"आद. प्रतिभा जी,, शेर आप तक पहुंचे, कहना सार्थक हुआ। हार्दिक आभार"
Feb 10, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"आदरणीय अखिलेश जी,, ग़ज़ल पर शिरकत करने के लिये हार्दिक आभार"
Feb 10, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"जनाब मोहम्मद आरिफ साहिब,,, तहे दिल से शुक्रिया"
Feb 10, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"आदरणीया,,,क्या खूब ग़ज़ल कही है। अंतिम शेर तो लाजवाब है। वाह वाह और वाह"
Feb 10, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"सादर आभार राजेश कुमारी जी,,, असल में रात भी भारी मगर कहा था मूल में"
Feb 10, 2017
डॉ पवन मिश्र replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-76
"ग़ज़ल- झुग्गियां (प्रथम प्रस्तुति) ---------------------- २१२२ २१२२ २१२२ २१२ कौन कहता शह्र को बस लूटती हैं झुग्गियाँ। मुफ़लिसी में हो बशर तो थामती हैं झुग्गियाँ।। आग की वो हो लपट या भुखमरी या बारिशें। हर थपेड़े यार हँस के झेलती हैं झुग्गियाँ।। दिन…"
Feb 10, 2017
जयनित कुमार मेहता commented on डॉ पवन मिश्र's blog post ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ
"आदरणीय पवन मिश्र जी, सुन्दर भावों से सजी इस बेहद खूबसूरत रचना के लिए बहुत बहुत बधाई आपको"
Feb 9, 2017

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर commented on डॉ पवन मिश्र's blog post ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ
"आदरणीय पवन जी, छोटी बह्र में बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने. शेर-दर-शेर दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. सादर "
Feb 8, 2017
डॉ पवन मिश्र commented on डॉ पवन मिश्र's blog post ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ
"आद. समर साहब, तहे दिल से शुक्रिया। मूल में सुधार कर् लिया है। पुनः आभार"
Feb 7, 2017
डॉ पवन मिश्र commented on डॉ पवन मिश्र's blog post ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ
"जनाब मोहम्मद आरिफ साहिब, बहुत बहुत शुक्रिया"
Feb 7, 2017
Samar kabeer commented on डॉ पवन मिश्र's blog post ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ
"जनाब डॉ.पवन मिश्र साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबफ पेश करता हूँ । चौथे शैर के ऊला में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखिये,'पर रख' ।"
Feb 6, 2017

Profile Information

Gender
Male
City State
कानपुर
Native Place
देवरिया
Profession
अध्यापक
About me
कर्म से अध्यापक हूँ।मन के भावों की टूटे-फूटे शब्दों में सहज अभिव्यक्ति का प्रयास करता हूँ।

डॉ पवन मिश्र's Blog

नवगीत- लुटने को है लाज द्रौपदी चिल्लाती है

अब तो आओ कृष्ण धरा ये थर्राती है।

लुटने को है लाज द्रौपदी चिल्लाती है।।

द्युत क्रीड़ा में व्यस्त युधिष्ठिर खोया है,

अर्जुन का गांडीव अभी तक सोया है।

दुर्योधन निर्द्वन्द हुआ है फिर देखो,

दुःशासन को शर्म तनिक ना आती है।।

लुटने को है लाज द्रौपदी चिल्लाती है।।

धधक रही मानवता की धू धू होली,

विचरण करती गिद्धों की वहशी टोली।

नारी का सम्मान नहीं अब आँखों में,

भीष्म मौन फिर गांधारी सकुचाती है।।

लुटने को है लाज द्रौपदी चिल्लाती…

Continue

Posted on December 11, 2017 at 8:30pm — 15 Comments

ग़ज़ल- आज फिर उसने कुछ कहा मुझसे

२१२२ १२१२ २२

आज फिर उसने कुछ कहा मुझसे।

आज फिर उसने कुछ सुना मुझसे।।

बाद मुद्दत के आज बिफ़रा था।

आज दिल खोल कर लड़ा मुझसे।।

जिसकी क़ुर्बत में शाम कटनी थी।

हो गया था वही ख़फ़ा मुझसे।।

दूर दिल से हुए सभी शिकवे।

टूट कर ऐसे वो मिला मुझसे।।

दरमियाँ है फ़क़त मुहब्बत ही।

अब कोई भी नहीं गिला मुझसे।।

चांद तारे या वो फ़लक सारा।

बोल क्या चाहिए ? बता मुझसे।।

क़ुर्बत= सामीप्य

फ़लक=…

Continue

Posted on December 3, 2017 at 1:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ

22 22 22 2


नवजीवन की आशा हूँ।
दीप शिखा सा जलता हूँ।।

रक्त स्वेद सम्मिश्रण से।
लक्ष्य सुहाने गढ़ता हूँ।।

जीवन के दुर्गम पथ पर।
अनथक चलता रहता हूँ।।

प्रभु पर रख विश्वास अटल।
बाधाओं से लड़ता हूँ।।

घोर तिमिर के मस्तक पर।
अरुणोदय की आभा हूँ।।

भावों का सम्प्रेषण मैं।
शंखनाद हूँ कविता हूँ।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Posted on February 5, 2017 at 6:58pm — 12 Comments

नवगीत- आया जाड़ा हाड़ कँपाने

अँगड़ाई ले रही प्रात है,

कुहरे की चादर को ताने।

ओढ़ रजाई पड़े रहो सब,

आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

तपन धरा की शान्त हो गयी,

धूप न जाने कहाँ खो गयी।

जिन रवि किरणों से डरते थे,

लपट देख आहें भरते थे।

भरी दुपहरी तन जलता था,

बड़ी मिन्नतों दिन ढलता था।

लेकिन देखो बदली ऋतु तो,

आज वही रवि लगा सुहाने।

आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

गमझा भूले मफ़लर लाये,

हाथों में दस्ताने आये।

स्वेटर टोपी जूता मोजा,

हर आँखों ने इनको…

Continue

Posted on January 22, 2017 at 8:30pm — 11 Comments

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At 5:52pm on January 1, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
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