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ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा-अंक 73 में शामिल सभी ग़ज़लों का संकलन (चिन्हित मिसरों के साथ)

परम आत्मीय स्वजन
73वें तरही मुशायरे का संकलन हाज़िर कर रहा हूँ| मिसरों को दो रंगों में चिन्हित किया गया है, लाल अर्थात बहर से खारिज मिसरे और हरे अर्थात ऐसे मिसरे जिनमे कोई न कोई ऐब है|

ASHFAQ ALI 
बढ़ रहे क्यों कदम दुश्मनी की तरफ
आइए आइए दोस्ती की तरफ

मुस्कुराहट लबों पर हो दिल में वफा
जब भी देखो किसी आदमी की तरफ

प्यार से रोक लो अपने भाई को तुम
बढ़ रहा है अगर ग़ुमरही की तरफ

जिसको देखो वह दीवाना फैशन का है
देखता ही नहीं सादगी की तरफ

याद आने लगा मुझको माज़ी मेरा
जब भी देखा किसी झोपड़ी की तरफ

खुद भी अपने गिरेबान में झांक लो
जब भी उंगली उठाओ किसी की तरफ

हम तो पलकें बिछाने को तैयार हैं
आइए तो हमारी गली की तरफ

मौत ने जब पुकारा हमें दोस्तो
"हमने देखा नहीं जिंदगी की तरफ"

राहे हक़ से हटेंगे न 'गुलशन' कभी
आ गए हैं तेरी रहबरी की तरफ

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Mohd Nayab

आ गए जो तेरी रहबरी की तरफ
कैसे जाएंगे वो गुमरही की तरफ

मुश्किलें भी यहां राहतें भी यहाँ
गौर से देखिए ज़िन्दगी की तरफ

नेक औरत है वो बिलयकीं दोस्तो
जिसने देखा नहीं अजनबी की तरफ

जो थे अपने वही सब पराए हुए
देखते क्या मेरी मुफलिसी की तरफ

जाओगे तुम किधर ये बता दो हमें
दोस्ती की तरफ, दुश्मनी की तरफ

छोड़ कर आ गए सारी दुनिया के ग़म
"हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ"

यह बता दो हमें क्या हुआ शैख़ जी
आप भी आ गए मयकशी की तरफ

उसकी क़िस्मत यकीनन संवर जाएगी
आ गया जो तेरी बंदगी की तरफ

हमने 'नायाब' देखा है जब से तुम्हें
मुड़ के देखा नहीं फिर किसी की तरफ

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Mahendra Kumar


जा रही है सड़क किस गली की तरफ़?
दोस्ती की तरफ़, दुश्मनी की तरफ़?

थे चले हम कहाँ से कहाँ आ गये
छोड़ के ज़िन्दगी, ख़ुदकुशी की तरफ़

जा रहा है समन्दर भी लो हार के
एक ठहरी हुई सी नदी की तरफ़

मुफ़लिसी में मिला क्यूँ न कोई ख़ुदा
तीरगी ही मिली तीरगी की तरफ़

सोचता हूँ उसे सोचता ही रहूँ
देखता भी रहूँ बस उसी की तरफ़

हैं अजब से मुहब्बत के ये रास्ते
आप ही से चलें आप ही की तरफ़

तप रहा आग से है ये सूरज मगर
उठ रहा है धुआँ चाँदनी की तरफ़

हर तरफ़ दिख रहे ज़ख्म बिखरे हुए
राह मुड़ ही गयी शायरी की तरफ़

मौत भी रूठ जाए न हम से कहीं
"हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ़"

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Saurabh Pandey


आ गये दूर हम तीरगी की तरफ़
आइये, अब चलें रोशनी की तरफ़

आप तो सभ्य हैं, फिर नज़र फेर लें
देखना क्यों भला टुच्चई की तरफ़ ?

क़ौम का था वो बन्दा तभी मौत पर
त्यौरियाँ चढ़ रहीं सर्जरी की तरफ़

आज कोई तो हो निर्भया के लिए..
कृष्ण जैसे रहे द्रौपदी की तरफ़

बुलबुलें देर तक कब रहीं ख़ौफ़ में ?
ख़ौफ़ टिकता नहीं नगमगी की तरफ़ !

’अपनी बगिया लगे बेल फूले-फले’--
सोच देखे पिता लाडली की तरफ़

क्या पता उसने क्या आईने से सुना
चल दिया एक दिन मुम्बई की तरफ़

आर्द्र वातावरण व्याप जाये पुनः,
वृत्ति एकाग्र है आरती की तरफ़

उन कबूतर-से पाँवों में उलझे रहे
’हमने देखा नहीं ज़िन्दग़ी की तरफ़’

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MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी)


जब से देखा है हमने ख़ुशी की तरफ
मुड़ के देखा नही सादगी की तरफ

थे सरे बज़्म वेसे तो लाखों हसीं
हर नज़र थी मगर आप ही की तरफ

मुझको फरहाद-ओ-मजनु की याद आ गयी
ध्यान जब भी गया आशिक़ी की तरफ

राहे हक़ पर बढ़े जब हमारे क़दम
"हमने देखा नही ज़िन्दगी की तरफ"

दोस्तों का भरोसा करूँ किस तरह
दोस्ती हो गयी दुश्मनी की तरफ

जब अमीर-ए-शहर ख़ुद परेशान है
कौन देखे भला मुफ्लिसी की तरफ

देख कर जानवर भी ये हैरान हैं
आदमी क्यूँ नही आदमी की तरफ

पैरवी आप 'रिज़वान' ख़ुद की करें
किस लिए जाइये बेख़ुदी की तरफ

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harkirat heer


जब कभी देखते तीरगी की तरफ़
पाँव उठते मगर रोशनी की तरफ़

पा लिया है उन्हें सोचकर खुश रहे
क्या पता था चले बेकसी की तरफ़

क्यूँ लिए जा रही जिंदगी तू मुझे
इश्क़ की आग में मुंतही की तरफ़

याद ने रातभर आँख लगने न दी
ताकते ही रहे चाँदनी की तरफ़

मुस्कुराने लगे लफ्ज़ मेरे सभी
जब से फेरा है मुँह शायरी की तरफ़

क्यूँ खड़े दूर तुम पास आओ ज़रा
कुछ बढाओ क़दम दोस्ती की तरफ़

ज़ख्म पहले मिले जो न सूखे अभी
ज़िंदगी जा रही फिर ग़मी की तरफ

खामियां हैं बहुत हममें' माना मगर
देखते कुछ तो' अपनी कमी की तरफ़

अश्क़ भी दे दिये ज़ख्म भी दे दिये
हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ़

जब कभी भी लगें टूटने हौसले
तुम बढ़ाना कदम बंदगी की तरफ़

हैं मिली 'हीर' नाकामियाँ ही तुझे
जब कभी भी बढ़ी आशिक़ी की तरफ़

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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"


आइये हम चलें रागिनी की तरफ़।
पुस्तकों में छिपी रौशनी की तरफ़।।

बुद्धि रथ पर चढ़ें,पाठशाला चलें।
आ चलें ज्ञान की बन्दगी की तरफ़।।

खुद में कौशल जगाएं बनें पात्र हम।
ध्यान दे खुद की हम, क्वालिटी की तरफ़।।

एक विनती मगर आप से है मेरी।
लक्ष्य अपना रहे सादगी की तरफ़।।

जानवर आजकल अपने प्रतिमान हैं।
आप लेकिन रहें आदमी की तरफ़।।

जो हुईं गल्तियाँ हैं विगत में कई।
ध्यान बरबस गया है उसी की तरफ़।।

कष्ट है की प्रगति पथ पे चलते हुए।
हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ़।।

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Manoj kumar Ahsaas


बेबसी की तरफ ,चांदनी की तरफ
दिल चलें चल ज़रा दिल्लगी की तरफ

आप फिर से परखने को आएं मुझे
है मेरी भी नज़र आप ही की तरफ

भूखे बच्चों के मुँह में निवाला नहीं
चल रहा है जहाँ रौशनी की तरफ

जिसमे मतला नहीं उसका मिसरा है ये
हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ

उनका खत तक न हमसे जलाया गया
कैसे चलते भला रौशनी की तरफ

इसलिए हम पे हँसता रहा ये जहाँ
मुस्कुराते रहे हर किसी की तरफ

एक मुद्दत से देखा नहीं है उसे
दिल खिंचा जाता मैकशी की तरफ

आप ही आप हैं मेरी मंज़िल सदा
राह कोई नहीं आप ही की तरफ

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Tasdiq Ahmed Khan

कौन देखे भला अब किसी की तरफ
हर नज़र है लगी आप ही की तरफ

जब भी डाली नज़र ज़िंदगी की तरफ ।
गम दिखाई दिए हैं ख़ुशी की तरफ ।

सिर्फ कहते ही हैं वह बढ़ाते नहीं
हाथ अपना कभी दोस्ती की तरफ ।

बे वफाई का बुहतान जिसने रखा
उसने देखा नहीं बे बसी की तरफ ।

वह सदा खुश रहें सिर्फ यह सोच कर
हम ने देखा नहीं ज़िंदगी की तरफ ।

हश्र से कम कहाँ इंतजारे सनम
कोई रह रह के देखे घडी की तरफ ।

लौट कर आ न पाया वो वापस कभी
जो गया उनके घर की गली की तरफ ।

हुस्न की बे वफाई का देखो करम
जा रहा है कोई मैकशी की तरफ ।

वक़्ते रुखसत का मंज़र क़ियामत बना
दस्त दिल पर नज़र पालकी की तरफ ।

उसको कैसे मसीहा कोई मान ले
चल रहा है जो राहे बदी की तरफ ।

यूँ ही तस्दीक तू मुश्किलों में नहीं
हर क़दम है तेरा रास्ती की तरफ ।

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Ahmad Hasan


अपना रुजहान है नौकरी की तरफ ।
फिर तो बढ़ना है धोका धड़ी की तरफ ।

अपने ऑफिस में बदनाम दो चार हैं
उँगलियाँ उठ रही हैं सभी की तरफ ।

माएँ जन्ती तो हैं हूरो -गिलमान को
उम्र बढ़ती है तर दामनी की तरफ ।

ये तो है, मुझसे अच्छा वो है इस लिए
मेरे सब हैं उसी अजनबी की तरफ ।

चीरघर से सुबुक दोश जब हो गए
हम ने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ ।

पुर खतर राह पर बढ़ते जाते तो हो
ध्यान रखना ज़रा आगही की तरफ ।

बोस ,जापानी आकाश में गुम हुए
गांधी ,नेहरू गए जर्मनी की तरफ ।

गंगा मैया तनिक स्वच्छ हो ना सकी
सब का मैलान है गंदगी की तरफ ।


घुप अँधेरा है अज्ञान की स्थली
ज्ञान गतिशील है रौशनी की तरफ ।

रहनुमाई नया शग्ल अहमद का है
या कि रुजहान है रहज़नी की तरफ ।

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डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव


है मेरी दृष्टि अब भारती की तरफ
भावना से भरी आरती का तरफ

वेदना का शिखर देखता मौन है
बह रही हर करुण निर्झरी की तरफ

कौन देता है यह व्यर्थ की बात है
ध्यान तो मात्र है मधुकरी की तरफ

दंभ अभिमान से की सदा अर्चना
मन झुका ही नही चाकरी की तरफ

मागते है जलधि शारदा से सभी
देखते पर नहीं गागरी की तरफ

एक दुर्धर्ष योद्धा रहा हूँ सदा
हमने देखा नहीं जिदगी की तरफ

चातुरी कृष्ण की फिर न लौटे कभी
राधिका की करुण आतुरी की तरफ

सर्व गुण आगरी मातु है राधिका
यह गजल अब उन्ही नागरी की तरफ

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जयनित कुमार मेहता

सबकी नज़रें हैं मेरी ख़ुशी की तरफ़।
कोई तो देख ले बेबसी की तरफ़।

ऐसे खिंचते गए अजनबी की तरफ़,
जैसे मुजरिम कोई हथकड़ी की तरफ़।

आदमी हैं, मगर आदमीयत नहीं
आप मत जाइए उस गली की तरफ़।

ज़ेह्न पर उम्र भर मौत का था ख़ुमार,
"हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ़।"

क़ामयाबी क़दम चूम लेगी तेरे,
देखना छोड़ दे जब घड़ी की तरफ़।

दर्द-ए-दिल अपने हद से गुज़रने लगा,
तो मुख़ातिब हुए शाइरी की तरफ़।

देख मंज़र ये, सब लोग हैरान हैं,
इक नदी चल पड़ी तिश्नगी की तरफ़।
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गिरिराज भंडारी

कोई देखा नहीं जब हमारी तरफ
हम ही देखें भला क्यूँ किसी की तरफ

दिलकशी हर बनावट में तुमको मिली
तुमने देखा कहाँ सादगी की तरफ

ग़म भी गमगीन होता है ये सोच कर
क्यों सभी देखते हैं खुशी की तरफ

क्यूँ उजाला तुझे देखने आयेगा
तुमने देखा कभी रोशनी की तरफ ?

सब की सोचें अलग सबकी चाहत ज़ुदा
कैसे देखे कोई हर किसी की तरफ

चाँद को यूँ दिखायी थी औकात कल
ताकते हम रहे चाँदनी की तरफ

सारे मजलूम की सुन के आहो फुगाँ
कैसे मिसरे मुड़ें आशिक़ी की तरफ

छेड़ नग्में जो बेदार कर दें हमें
जा न पाये कोई बेख़ुदी की तरफ

हार कर ज़िन्दगी से नहीं, जीत कर
ऐ ख़ुदा , मै चला बन्दगी की तरफ

अर्थ खोने लगी अब मेरी शाइरी
लफ़्ज़ झुकने लगे खामुशी की तरफ

जबसे जाना सुकूँ मौत देगी हमें
’’हमने देखा नही ज़िन्दगी की तरफ’’

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Amit Kumar "Amit"

अपने महबूब की आशिक़ी की तरफ l
हो गये हम फ़ना सादगी की तरफ l l १ l l

छोड़ कर क्यों हमें बेख़ुदी की तरफ l
आप बढ़ने लगे रौशनी की तरफ l l २ l l

जब से शौक़-ए-नशा हमको उनका लगा l
हमने देखा नहीं ज़िंदगी की तरफ l l ३ l l

जाने कैसी ये तालीम होने लगी l
खुद , ख़ुशी मुड़ गई, ख़ुदकुशी की तरफ l l ४ l l

बेबसी में हमें जब ख़ुदा मिल गया l
खुद कदम बढ़ गये बन्दग़ी की तरफl l ५ l l

दुश्मनी की ये दीवार कैसी उठी l
आदमी ही नहीं आदमी की तरफ l l ६ l l

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Ashok Kumar Raktale

उसने लिखकर दिया मौलवी की तरफ
सारे ही आ गये रौशनी की तरफ

उठ गए जो कदम सरजमीं के लिए
“हमने देखा नहीं जिन्दगी की तरफ”

फर्ज इनका यही धर्म उनका यही
आदमी को रखे आदमी की तरफ

आ गए फिर घने बादलों के सिरे
जगमगाती हुई चाँदनी की तरफ.

कितने मजबूर हैं वो कदम दोस्तों
बढ़ते ही जा रहे बेबसी की तरफ

लौट आओ मेरे दोस्तों मान लो
कुछ न पाओगे तुम उस गली की तरफ

लोग तो उंगलियां भी उठा ही देते हैं
आइने सी खरी दोस्ती की तरफ.

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rajesh kumari


हमनशीं चल दिया रोशनी की तरफ़
हम खड़े रह गए तीरगी की तरफ

शुष्क अशआर गम के लिए हाथ में
इक कलम मुड़ गई शायरी की तरफ़

दीप हँसता हुआ खुदबखुद बुझ गया
चाँद जब चल दिया चाँदनी की तरफ़

शानशौकत उन्हें उस तरफ़ भा गई
वो भला क्यूँ बढ़ें सादगी की तरफ़

हम जिये बस सदा दूसरों के लिए
हमने देखा नहीं जिन्दगी की तरफ़

देखकर हाथ से दूर हैं मंजिलें
रास्ते मुड़ गए बेबसी की तरफ़

ऐसे धोके मिले दोस्तों से हमे
हाथ बढ़ते नहीं दोस्ती की तरफ़

काटता आदमी को तो है आदमी
सांप आता नहीं आदमी की तरफ़

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Kalipad Prasad Mandal


राह को मोड़ दो दोस्ती की तरफ
जा रहा है वहाँ दुश्मनी की तरफ |

ले किधर जा रहा रहनुमा देश को
मंद गति जा रहा मुफलिसी की तरफ |

राह में ना चलो तुम बिना देख कर
देख लो जा रही किस गली की तरफ |

झूठ को सत्यता से तुम्हे झेलना
हम ने देखा नहीं जिंदगी की तरफ |

हम ने सोचा कभी उद्यमी की तरह
कर्म उसको लिया आलसी की तरफ |

आम को हो गया भूल का इल्म अब
राज नेता बढे फायदे की तरफ |

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शिज्जु "शकूर"


इक ग़ुमाँ लाया है तीरगी की तरफ
जाल था ग़ालिबन रौशनी की तरफ

ऐ ख़ुदा दिल की तह से तेरा शुक्रिया
ज़िन्दगी मोड़ दी ज़िन्दगी की तरफ

हाँ मुकद्दस नवा है अजाँ इक, वहीं
पाक़ हाला दिखे आरती की तरफ

काफ़िया तय करो जब भी तो देखना
इक नज़र पुख़्ता हर्फ़े रवी की तरफ

आसमाँ पर न पत्थर उछालें जनाब
लौटकर आएगा आप ही की तरफ

धुन्ध हावी था नज़रों में इस वज्ह से
“हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ”

बढ़ चला काफिला नफरतों का ‘शकूर’
होके ‘कश्मीर’ से ‘दादरी’ की तरफ

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laxman dhami

देख लो तुम जो इस तीरगी की तरफ
रूख हमारा भी हो रोशनी की तरफ।1।

देवता हमसे तब तब खफा हो गए
बात जब भी रखी आदमी की तरफ।2।

हर कोई रंगतों का दीवाना हुआ
देखता कौन है सादगी की तरफ।3।

खौफ में मौत के हम रहे रात दिन
'हमने देखा नहीं जिंदगी की तरफ'।4।

कोई कैसे इसे तब मिटाए भला
है सियासत बहुत मुफलिसी की तरफ।5।

द्वेष हो कब तलक यूँ ही कश्मीर का
कुछ तो नजरें करो जरमनी की तरफ।6।

आदमी तो सितारों से आगे बढ़ा
आदमीयत हटी जाहिली की तरफ।7।

लोग मदहोश साकी को देखा किए
ध्यान किसका रहा तिश्नगी की तरफ।8।

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Sachin Dev


हमने देखा सदा दोस्ती की तरफ
चल पड़े तुम मगर दुश्मनी की तरफ

जुल्म को जुल्म कहने से डरने लगा
आदमी बढ़ रहा बुजदिली की तरफ

गोलियों की सदायें मुबारक तुम्हें
रुख हमारा रहा बाँसुरी की तरफ

भूल जा अब अँधेरे की बातें न कर
ध्यान अपना लगा रौशनी की तरफ

जिन्दगी से शिकायत न कोई रहे
लौट आ तू अगर सादगी की तरफ

मौत के खौफ से ही सहमते रहे
हमने देखा नही जिन्दगी की तरफ

हो उदासी अगर चेहरे पे कभी
देख लो फूल की ताजगी की तरफ

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Samar kabeer


दौड़ते हैं सभी दिल कशी की तरफ़
हम हमेशा रहे सादगी की तरफ़

चाँद की सम्त ऊँगली उठाई थी जो
था इशारा मिरा आप ही की तरफ़

इक अजब हू का आलम है तारी वहाँ
कोई जाता नहीं उस गली की तरफ़

तितलियाँ गुल से जाकर लिपटने लगीं
मख्खियाँ आ गईं गंदगी की तरफ़

ज़िन्दगी पाप की ख़ुशनुमा थी बहुत
लोग बढ़ते रहे गुमरही की तरफ़

आज मेरे किशन को ये क्या हो गया
देखता भी नहीं बाँसुरी की तरफ़

जानता सब हूँ 'ग़ालिब' चचा की तरह
दिल ये माइल नहीं बंदगी की तरफ़

इसके बर अक्स देखा नहीं है कभी
घुटना झुकता रहा पेट ही की तरफ़

जब ख़ुदा की इबादत में मशग़ूल थे
"हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ़"

उनका दीदार जबसे किया है "समर"
ये नज़र उठ न पाई किसी की तरफ़

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munish tanha


रास्ते खुल रहे दोस्ती की तरफ
देश मेरा बढ़े बाजिबी की तरफ
.
दिल जला तू जरा नींद भी फिर उड़ा
रास्ता है कठिन शायरी की तरफ
.
वो खुदा जो मिला है किसी को कभी
मुड़ गया फिर वही सादगी की तरफ
.
फायदा गर तुझे चाहिए देख ले
राम भी साथ हैं बन्दगी की तरफ
.
आप को चाहते इस कदर सोचिए
हम ने देखा नहीं जिन्दगी की तरफ
.
छोड़ दे वास्ता तू बुरे काम को
अब कदम तू बढ़ा रौशनी की तरफ

_____________________________________________________________________________

दिनेश कुमार


रात भर जो रहा तीरगी की तरफ़
वो ही था सुबह को रौशनी की तरफ़

दूसरों पर ही ऊँगली उठाता रहा
मैंने देखा न अपनी कमी की तरफ़

बन्द रहती है हर पल वो खिड़की भी अब
मैं भी जाता नहीं उस गली की तरफ़

दौरे-गर्दिश का देखो बहाना लिए
चल दिए हैं कदम मैकशी की तरफ़

ए ख़ुदा मुझको इतनी कमाई तो दे
हाथ फैलें न मेरी किसी की तरफ़

उम्र गुज़री सराबों के आग़ोश में
" हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ "

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Dr Ashutosh Mishra

ले मुकद्दर गया तीरगी की तरफ
पर नजर आज भी चांदनी की तरफ

तेज बारिश में पत्ते तने कल जो थे
खुद व खुद झुक गए थे जमी की तरफ

तख़्त पे फांसी के आख़िरी वक़्त भी
थी नजर वीर की सरजमी की तरफ

पी के हर पल नदी सिन्धु प्यासा रहा
है तभी तो नजर बस नदी की तरफ

टूट ही तब गया हौसला दीप का
जब हवा भी मिली तीरगी की तरफ

इश्क भी है गजब आँख ज्यों ही मिली
मुड़ गए थे कदम अजनबी की तरफ

पीठ पर वार जब से किया यार ने
हमने देखा नहीं ज़िंदगी की तरफ

जानवर हो भले कितने भी जंगली
लाश की उंगली थी आदमी की तरफ

हाथो में बच्चो के ये किताबें कहें
बढ़ रहा है वतन रोशनी की तरफ

फैसला कर सका आज मुनसिब नहीं
देखकर बच्चे की बेबसी की तरफ

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सतविन्द्र कुमार 


बात उनकी बढ़ी सादगी की तरफ
रात अपनी गई रौशनी की तरफ।

वो पड़ोसी बदी छोड़ता ही नहीं
हम चले हर कदम दोस्ती की तरफ।

ये हुआ दर्द देखो नहीं ठीक है
ले हमें जा रहा मौत ही की तरफ।

क्या चलूँ साथ लेकर उसे मैं कभी?
वह बढ़ा ही नहीं है किसी की तरफ।

जो चला दौर ये है रहा मौत का
'हमनें देखा नहीं जिंदगी की तरफ'।

बाज़ आ जाइए छोड़ रुशवाइयां
हम चलें अब कहीँ बन्दगी की तरफ।

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Ravi Shukla

वो उमीदों से देखे सभी की तरफ ,
काश ! देखे कोई बेबसी की तरफ।

दे रहा था मज़ा इन्तज़ार आपका ,
याद फिर चल पड़ी आप ही की तरफ।

हो हमेशा जहां रात ही ज़िन्दगी ,
कैसे देखे कोई रोशनी की तरफ ।

सिलवटों का न था दख्ल कुछ नींद में,
हम ही देखा किये चांदनी की तरफ ।

जब खलिश दे रही हो मज़ा इश्क में ,
ध्यान जाता नही बेकली की तरफ ।

दे रही थी हमें जब तलक राहतें,
हमने देखा नही ज़िन्दगी की तरफ।

ऊब कर ऐशो इशरत से ऐ शुक्ल जी
हम ने रुख कर लिया सादगी की तरफ।

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अजीत शर्मा 'आकाश' 


ज़िन्दगी ले चली बेबसी की तरफ़ ।
कोई देखे भी कैसे ख़ुशी की तरफ़ ।

हमने उल्टा सफ़र आज तक तय किया
रौशनी से बढ़े तीरगी की तरफ़ ।

जाने मसरूफ़ कितना ख़ुदा हो गया
देखता ही नहीं आदमी की तरफ़ ।

होगी घातक बहुत बढ़ती असहिष्णुता
मेरा संकेत है हर किसी की तरफ़ ।

जूझते, मरते-खपते रहे हर घड़ी
[[हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ़]]

कैसे ‘आकाश’ हालात आने लगे
ज़िन्दगी चल पड़ी ख़ुदकुशी की तरफ़ ।

_______________________________________________________________________________

sagar anand 


जश्न होता रहा मयकशी की तरफ
लोग आते रहे तिश्नगी की तरफ

हर कोई चाहता है हंसी की नजर
कौन आता है अब बेबसी की तरफ

देर से गुमशुदा जो अंधेरों में हैं
हां उन्हें ले चलो रौशनी की तरफ

सांस लेते हुए हम थे जिंदा, मगर
हमने देखा नहीं ज़िंदगी की तरफ

आदमी, आदमी की तरह क्यूं नहीं
क्यूं उठी उंगलियां आदमी की तरफ

कब तलक दुश्मनी हम निभाते रहें
हाथ फिर से बढ़े दोस्ती की तरफ

और क्या मैं बुलंदी की कीमत कहूं
मेरी सांसें भी हों शायरी की तरफ

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vandana

राह निकली जरा सादगी की तरफ
और झुकने लगी रोशनी की तरफ

खुद का सम्मान चाहें वो दे गालियाँ
गौर फरमाइए मसखरी की तरफ

आ गए हम न जाने ये किस मोड़ पर
उठ रहे क्यों कदम गुमरही की तरफ

ईद के बाद देखी नहीं सब्जियाँ
कर्ज ऐसे चढ़ा मुफलिसी की तरफ

ये शिकायत कभी माँ तो करती नहीं
हमने देखा नहीं जिंदगी की तरफ

हाँ जरा शाम का रंग चढ़ने तो दो
चल पड़ेंगे कदम आरती की तरफ

पत्थरों की ही मानिंद बहना मुझे
इक शिवाला कहे चल नदी की तरफ

__________________________________________________________________________________

Manan Kumar singh

उठ गयी है नजर उर्वशी की तरफ
उसने देखा कहाँ निज गली की तरफ।1

खूब होते रहे हैं गिले रातभर
ध्यान जाता कहाँ बंदगी की तरफ।2

रह गये ढेर घर के सपन अनछुए
उसने देखा मगर मनचली की तरफ।3

चलते चलते मिले जो सनम बेरहम
हमने देखा नहीं जिंदगी की तरफ।4

मौज का तो मसीहा हुआ है वही
जिसने झाँका नहीं बेबसी की तरफ।5

लूटता आज मोती कुटिल काक है
फिर के देखा नहीं हंस जी की तरफ।6

कृष्ण की दे रहे सब दुहाई यहाँ
हाथ उठते मगर कंस ही की तरफ।7

___________________________________________________________________________________

मोहन बेगोवाल

दिल न जाए अगर रौशनी की तरफ
तुम बता फिर मिले बेबसी की तरफ

याद में हो कभी पास तो आएगी
फैल जाती हवा हर किसी की तरफ

हार जब थे गए प्यार में आप के
“हमने देखा नहीं जिंदगी की तरफ”

बात कहने से पहले हमें वो कहे
क्यूँ न सवाल हो रहबरी की तरफ

कोई कितना भी अपना हो जाएगा
पर निभाए नहीं आदमी की तरफ

इस गली कौन पहचानता है उसे
बस वो गुजरा यहाँ अजनबी की तरफ

___________________________________________________________________________________

योगराज प्रभाकर 


दुश्मने क़ौम की पैरवी की तरफ
सब हरे की तरफ, केसरी की तरफ
.
दो क़दम क्या उठे, रौशनी की तरफ
सौ भवें तन गईं, झोंपड़ी की तरफ
.
इक बेचारी गई, चाकरी की तरफ
हाथ बढ़ने लगे, ओढ़नी की तरफ
.
कमतरी की मुनादी शुरू हो गई
कामज़न जब हुआ बढ़तरी की तरफ
.
दो बरस आखिरन हो गए रूबरू
जब दिसंबर बढ़ा जनवरी की तरफ
.
जो गया वो गया, जो बचा सो बचा
बारहा देखना क्या बही की तरफ
.
वार करने से डरती रही वो छुरी
पीठ हरदम रही जिस छुरी की तरफ
.
जाविदानी रही मौत से आशिक़ी
हमने देखा नहीं ज़िन्दगी की तरफ
.
टिकटिकी बाँध कर ताकती जो मुझे
तक रहा हूँ उसी टिकटिकी की तरफ

______________________________________________________________________________

मिसरों को चिन्हित करने में कोई गलती हुई हो अथवा किसी शायर की ग़ज़ल छूट गई हो तो अविलम्ब सूचित करें|

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लाजवाब रचना। ......सर्व को हार्दिक बधाईया 

मुहतरम जनाब राणा साहिब, आपने मेरी ग़ज़ल के शेर 3से लेकर 11 शेर के सानी मिसरे
हरे कर दिए हैं ,महरबानी करके यह भी बता दीजिए कि इनमें क्या ऐब हैं ताकि सुधार किया जा सके

आदरणीय तस्दीक अहमद साहब आपकी ग़ज़ल के मतले में जो काफिया बंदी हुई है उसे बाक़ी के अशआर में निभाया नहीं गया है, यही एकमात्र कारण है कि मिसरे हरे रंग में हैं|

आदरणीय राणा प्रताप जी, क्या यह मतला ठीक है, मतलब क्या हम उसी और किसी को मतले के काफिये ले सकते हैं? अगर हाँ तब अन्य शेरों में कौन कौन से काफिये लेने पड़ेंगे। अगर उसी और किसी को मतले में लेना अनुचित है तब इनको भी हरे रँग में कीजिये सर। कृपया मार्गदर्शन कर शंका दूर करें आदरणीय।

जी आप बिलकुल सही कह रहे हैं , मतले को भी हरे रंग में होना चाहिए ..यहाँ सिनाद का ऐब है|

शुक्रिया आदरणीय संशय दूर करने के लिये। सादर।
एक और संशय है आदरणीय।
सबकी नज़रें हैं मेरी ख़ुशी की तरफ़।
कोई तो देख ले बेबसी की तरफ़।
जयनित साहब का यह मतला क़ाफ़िया बंदी के हिसाब से ठीक है ? अपनी जानकारी के लिये ही पूछ रहा हूँ सर।

जी ये मतला सही है, देवनागरी और उर्दू में , दोनों भाषाओं में ये एक अलग उच्चारण के वर्ण हैं इसलिए ही यह मतला बिलकुल दुरुस्त है|

इनायत। मेहरबानी। आ. राणा साहब। शुक्रिया।
मुहतरम जनाब राणा साहिब, जो मिसरा तरह दी गयी उसका क़ाफ़िया ये था ,मेरा हर शेर का क़ाफ़िया उसेपूरा करता है ,आपकी बात से में मुत्मइन नहीं हूं ,बाकी आपकी मर्ज़ी चाहे शेर को हरा करें या लाल ,यह तो आपके अख्तयार में है ।

हुजूरे आली आपने मतले में जो काफियाबंदी की है उसे बाकी के अशआर में निभाना फ़र्ज़ है या नहीं, आप मतला हटा लें और हुस्ने मतला को मतला बना लें तो आपकी पूरी ग़ज़ल दुरुस्त हो जायेगी|

मुहतरम जनाब राणा साहिब ,मेरी ग़ज़ल का मतला तब्दील करने की जहमत करें ।
कौन देखे भला अब किसी की तरफ
हर नज़र है लगी आप ही की तरफ
शुक्रिया

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